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बचपन में की थी स्कूल में पढ़ाई, पचपन में काट रहे 'वनवास'

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भीमापार। देश के विभिन्न शहरों से अनेक परेशानियों को झेलते हुए तमाम लोग अपने गांव पहुंच रहे हैं। इन्हें गांव के ही स्कूलों में बनाए गए क्वारंटीन सेंटरों पर ठहराया जा रहा है। यह वही स्कूल हैं, जहां बचपन में प्रवासी पढ़ने आते थे। आज जब पचपन की उम्र में पहुंचे तो यहां 14 दिनों का वनवास (होम क्वारंटीन) काट रहे हैं। यहां उनके कई सहपाठी भी साथ हैं, जो सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए पुराने दिनों की बातकर आपस में खुशियां बांट रहे हैं। लोगों को स्कूल पहुंचते ही बचपन के क्षण अनायास याद आ जा रहे हैं। दशकों बाद भी ककहरा पढ़ाने वाले गुरुओं के नाम इनकी जुबान पर याद हैं। विभिन्न प्रांतों में रहने वाले लोग यहां सालों बाद फुर्सत में मिले हैं।
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शनिवार की सुबह ‘अमर उजाला’ की टीम ने ऐसे कुछ क्वारंटीन सेंटरों का हाल जानना चाहा तो कैथवलिया गांव के प्राथमिक विद्यालय परिसर में बरगद का विशालकाय वृक्ष ही स्कूल में ठहरे प्रवासियों का सहारा बना हुआ है। इस गांव के सियाराम यादव, हनुमान यादव और धर्मेंद्र गोंड सूरत से जबकि प्रमोद गुप्ता, धनंजय खरवार और दीपक विश्वकर्मा मुंबई से आकर यहां ठहरे हुए हैं। इन्हें तीन दशक पहले पढ़ाने वाले अपने गुरुओं सुरजबली सिंह और विंध्याचल सिंह के नाम जुबान पर याद हैं। इन लोगों ने बताया कि लॉकडाउन फर्स्ट के दिन तो इन लोगों ने परदेश में यह सोचकर काट लिया कि लॉकडाउन खत्म होते ही कामधाम शुरू होगा और जिंदगी जल्द ही पटरी पर लौट आएगी लेकिन लॉकडाउन टू की घोषणा होते ही हिम्मत पस्त हो गई। अंतत: हम अपने घरों के लिए निकल लिए और किसी तरह यहां तक पहुंचे।
इसी तरह, भीमापार के पूर्व माध्यमिक विद्यालय में ठहरे नीरज गोंड ने बताया कि अभी एक दिन पूर्व ही वह यहां पहुंचा है। विद्यालय अपना है। यहां आने के बाद बचपन की पुरानी यादें ताजी हो गई लेकिन अभी स्कूल का ताला बंद है। बाहर ही समय गुजारना पड़ रहा है। दोपहर की भीषण गर्मी में यहां बाहर बरामदे में प्रवासियों को लू का भी सामना करना पड़ रहा है। जबकि मसूदपुर प्राथमिक विद्यालय में क्वारंटीन हुए दो सगे भाई सुरेश विश्वकर्मा मुंबई और राजकुमार विश्वकर्मा बंगलुरू से यहां आकर ठहरे हैं। सेकेंड लॉकडाउन के बाद जब वे घर को चले तो ट्रेन की टिकट के अलावा उनकी जेब में फूटी कौड़ी भी नहीं थी। क्वारंटीन कर रहे लोगों ने बताया कि इस दौरान लॉकडाउन और सोशल डिस्टेन्सिंग से जुड़े सरकारी निर्देशों का पालन भी वे बखूबी कर रहे हैं। अनौनी प्राथमिक विद्यालय में ठहरे बसंत यादव ने बताया कि वे मुंबई में नौकरी कर रहे अपने बच्चों का हालचाल लेने गए थे लेकिन लॉकडाउन में वे भी वहां फंस गए। ट्रक में सवार होकर वह किसी तरह गांव पहुंचे। अब क्वारंटीन के रूप में वनवास काट रहे हैं।
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