कोई हत्या के आरोप में सजा काट रहा है तो कोई चोरी के जुर्म में। पर धरती किसी को गुनहगार नहीं मानती। यही कारण है कि बंदूक वाले हाथ जब खुर्पी, कुदाल लेकर निकले तो धरती भी उनकी भरपूर हौसला आफजाई की। कैदियों ने जेल की जमीन में कुछ बिरवे लगाए और खेती लहलहा उठी। जेल परिसर में वर्षों से परती पड़ी 18 बीघे जमीन पर बंदियों ने सब्जियों के बीज बोए। निराई, गुुडाई की समय से खाद-पानी दिया। उनकी मेहनत का नतीजा है कि इस बार इफरात तरकारी पैदा हुई है। बंदी अपनी मेहनत से उगाई ताजी सब्जियों का स्वाद ले रहे हैं।
जिला जेल में 18 बीघे भूमि वर्षों से निष्प्रयोज्य पड़ी थी। सिंचाई के लिए जेल परिसर में लगे पांच हार्स पावर का मोटर लगाया गया था जो पांच वर्ष पहले जल गया था। सिंचाई का साधन न होने के कारण इस जमीन पर ठीक से खेती नहीं कर पा रहा था। जेल प्रशासन के प्रयास से ट्यूबवेल दुरुस्त करा दिया। सिंचाई की सुविधा हुई तो जेल
परिसर में परती पड़ी 18 बीघे की भूमि पर बंदियों ने खेती शुरू कर दी। इसमें 12 बीघे में आलू की खेती की गई।शेष छह बीघे में गोभी, मिर्ची, मटर, गोभी, मेथी, पालक, चुकंदर, मूली, बैंगन आदि मौसमी सब्जियों की बुवाई की गई। बंदियों की मेहनत से सब्जियों की अच्छी पैदावार हुई है। सब्जियों की अच्छी पैदावार से न सिर्फ जेल प्रशासन को
राहत मिली है बल्कि बंदियों को भोजन के साथ पर्याप्त हरी सब्जियां दी जा रही हैं। सब्जियों की पैदावार अच्छी होने को लेकर बंदी भी उत्साहित हैं। अब वे प्याज, लौकी और कोहड़ा की खेती करने जा रहे हैं। आमतौर पर जेलों में खाने को लेकर शिकायतें सामने आती रहती हैं लेकिन यहां की जेल में दोनों वक्त भोजन में पर्याप्त हरी सब्जी और सलाद मिलने बंदी भी संतुष्ट हैं। जेल प्रशासन की मानें तो आलू की पैदावार ऐसी हुई है कि साल भर तक काम चलेगा। सब्जियों की खेती के लिए शासन से बजट मिलता है।
बंदियों की सेहत के साथ ही उनकी मनोवृत्ति बदलने की दिशा में निरक्षर बंदियों को साक्षर बनाने, भजन कीर्तन, प्रेरक कहामियों की किताबें भी उपलब्ध कराई जाती हैं। जेल में पढ़ने वाले बंदियों से अधिक काम नहीं लिया जाता है। इसके अलावा जेल प्रशासन की ओर से समय-समय पर महिला और पुरुष कैदियों को रोजगार उन्मुख प्रशिक्षण भी दिया जाता है। महिला बंदियों को सिलाई, पेटिंग और पुरुष बंदियों को कम्प्यूटर का प्रशिक्षण दिया जाता है।