परिसीमन के चलते सैदपुर विधानसभा सीट की भौगोलिक स्थितियां बदलती रही हैं। वर्ष 1952 में प्रदेश की लगभग सभी विधानसभा सीटें द्वीसदस्यीय हुआ करतीं थी। तब इस विधानसभा सीट से कमला सिंह यादव भारतीय प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और देवराम कांग्रेस के टिकट पर जीते थे। 1952 के बाद द्वीसदसीय प्रतिनिधित्व की व्यवस्था समाप्त कर दी गई और विधानसभा क्षेत्र में एक सदस्यीय प्रतिनिधित्व व्यवस्था लागू हुई।
चुनाव आयोग की व्यवस्था के तहत दस वर्ष बाद हुए परिसीमन में वर्ष 1967 में यह सीट गाजीपुर जिले की न होकर वाराणसी जिले के अंतर्गत कर दी गई थी। सैदपुर सीट के 75 प्रतिशत मतदाता वाराणसी जिले के चोलापुर, हरहुआ एवं चिरईगांव आंशिक से हुआ करते थे। सैदपुर ब्लॉक के मात्र 25 प्रतिशत मतदाता ही इसमें शामिल थे।
उस वक्त सैदपुर विधानसभा क्षेत्र की सीट वाराणसी जिले की मानी जाती थी, इसलिए नामांकन से लेकर मतगणना तक के सभी कार्य वाराणसी जिले में ही हुआ करते थे। जीत-हार की घोषणा भी वाराणसी जिले से हुआ करती थी। उस समय सैदपुर की सीट सामान्य सीट के रूप में थी। इस विधानसभा सीट से कई दिग्गजों ने अपनी तकदीर आजमाई और प्रदेश सरकार में प्रतिनिधित्व भी किया।
इस सीट के इतिहास में यहां से प्रतिनिधित्व करने वाले विधायकों में प्रभुनारायण सिंह, डॉ. महेंद्रनाथ पांडेय, लालजी चौहान एवं कैलाशनाथ यादव के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। वर्ष 2012 में सैदपुर सीट सामान्य नहीं रह गई। वर्ष 2012 में इस सीट को सुरक्षित सीट घोषित कर दिया गया और वाराणसी जिले के सभी भाग इस सीट से निकाल दिए गए।
वर्ष 2012 में सैदपुर सीट पुन: गाजीपुर जिले की सीट कर दी गई। इस सीट की भौगोलिक स्थिति बदलने के लिए सादात विधानसभा क्षेत्र का अस्तित्व समाप्त कर इसे सैदपुर की सीट में तब्दील कर दिया गया। इसी सुरक्षित सीट पर सुभाष पासी ने वर्ष 2012 और 2017 में सपा के टिकट पर अपना परचम लहराया। वे अब सपा का दामन छोड़कर भाजपा में आ गए हैं।