गाजीपुर। भदौरा ब्लॉक से छह किमी दूर अमौरा गांव निवासी 76 वर्षीय किसान रंग बहादुर सिंह पीएम मोदी के बुलावे पर स्वतंत्रता दिवस के मुख्य समारोह में हिस्सा लेने के लिए आज नई दिल्ली के लिए रवाना होंगे। देश के 12 किसानों में उनका भी चयन किया गया है। रंग बहादुर सिंह इस समय किसानों के लिए मिसाल बने हुए हैं। फलों की खेती के अलावा वह 12 प्रकार की औषधियों की खेती करके 12 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं।
रंग बहादुर की कहानी भी प्रेरक है। एक पत्रिका के लेख और तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के तीन शब्द खेती, प्रसंस्करण और मॉर्केटिंग ने उनका जीवन बदल दिया। इन शब्दों को उन्होंने जीवन में आत्मसात कर लिया। उनकी जिंदगी बदल गई। रंग बहादुर इस समय सेब, केला, आम, नारियल के अलावा 12 प्रकार के औषधीय खेती कर रहे हैं। इससे हर साल 12 लाख रुपये से अधिक कमाते हैं।
अब स्वतंत्रता दिवस पर दिल्ली में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विशेष आमंत्रित अतिथि के रूप में उन्हें बुलाया है। जहां वह देश के 12 और प्रदेश के 5 प्रगतिशील किसानों के साथ कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। वह इस समय पांच हेक्टेयर में अपने दो बेटों के साथ मिलकर खेती करते हैं। 12वीं तक साइंस साइड से पढ़ाई करने वाले रंग बहादुर सिंह बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय तिलकू सिंह दो भाई थे और 20 बीघे की खेती थी। ऐसे में उन्होंने पिता के साथ खेती करना शुरू कर दी। उनके मित्र व ददरी घाट निवासी सच्चिदानंद के पिता नंद किशोर राय की वर्ष 2021 में तबीयत खराब हो गई। जिन्हें देखने के लिए वह आए तो उनके घर उद्यमिता नाम की पत्रिका पढ़ने लगे। पत्रिका में उन्होंने प्रतापगढ़ के निवासी और मध्य प्रदेश के कोड़ा गांव निवासी राजा राम त्रिपाठी का लेख पढ़े। जिसमें सफेद मुसली की खेती से जुड़ी जानकारी थी। लेख को पढ़ने के बाद रंग बहादुर ने उनसे संपर्क किया। राजा राम त्रिपाठी से बात होने के बाद वह अपने बड़े बेटे जनार्दन सिंह के साथ लेकर बस्तर जिले के कोड़ा गांव में बने फॉर्म हाउस तक पहुंच गए। जहां 500 एकड़ में औषधीय खेती की थी। 8 फार्म हाउस विकसित किए थे। जहां से पहली बार 15 हजार रुपये देकर काल मेघ (लीवर टॉनिक में उपयोग होने वाली औषधीय) का बीज लिए और धीरे-धीरे औषधीय पौधों की खेती में अपने जीवन को समर्पित कर दिया है।
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पहली बार हुआ घाटा, तीसरे साल सीएम ने किया सम्मानित
रंग बहादुर बताते हैं कि पहली बार खेती में जानकारी न होने के कारण घाटा लग गया। वह वाराणसी मंडी में उत्पादन बेचने के बाद लागत का आधा भी नहीं पा सके। इसके बाद भी वह हार नहीं और दूसरी बार 2002 में मुसली (ताकत की दवाओं में उपयोग होने वाली) की खेती की। वह 45 हजार के बीज में एक लाख रुपये बचाए। 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने एक लाख रुपये का ईनाम दिया। साथ ही उनके खेती हर्बल गार्डन की मान्यता भी प्रदान की। उत्साह बढ़ा तो अगले साल 4 एकड़ में खेती की।
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आज भी याद हैं अप्रैल 2004 का वो दिन
6 अप्रैल 2004 में राजाराम के माध्यम से दिल्ली में तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम से मिले। रंग बहादुर सिंह कहते हैं कि उस समय देश के 18 किसानों के मिलने पहुंचे थे, जिसमें वह धोती-कुर्ता के लिवास में अकेले और किसान थे, जिससे तत्कालीन नजर उनकी नजर पड़ गई। वह बोले इस उम्र आपको इस क्षेत्र में कैसा लग रहा है, जवाब सुनने के सुनने के बाद वह बोले आप तीन काम करिए। इसमें पहला खेती, दूसरा प्रसंस्करण और तीसरा बाजार में बेचने का काम करिए। इन्हीं तीन बातों को रंग बहादुर सिंह ने अपने जीवन का मंत्र मिला और घर आने पर 25 हजार रुपये की मशीन कानपुर से मंगवाये।
राजा राम ने हर कदम पर दिया साथ
पहली बार में ही 20-25 क्विंटल मेघ पौधों को पाउंडर में बदला, जो 15 क्वींटल हुआ। इसे बेचने के लिए बड़े बेटे जनार्दन को वाराणसी मंडी में भेले, जिसे व्यापारियों ने लेने से मना कर दिया। इसके बाद राजा राम त्रिपाठी से संपर्क कर ब्यथा बताई तो उन्होंने ट्रेन से पूरा पाउंडर ही मंगा लिया और एक सप्ताह में एक लाख रुपये भी दिए। हौसला बढ़ा अस्व गंधा की खेती की। फिर सर्पगंधा की खेती और धीरे-धीरे 12 प्रकार की औषधियों की खेती करना शुरू कर दी। आज वह 12 लाख रुपये सालाना कमा रहे हैं।
इस तरह करते हैं खेती
सतावरी- 1 एक़ड़
एलोवेरा- आधा एकड़
ड्रैगन फ्रूट- 1 एकड़
सेब-80 पौधा
नारियल-40 पेड़
अस्वगंधा- आधा एकड़
चित्रक- 2 विश्वा
कालमेघ- आधा एकड़
पिपली-आधा विश्वा
ब्राह्मी- करीब आधा विश्वा
केला-8 बीघा
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छोटे बेटे करते हैं फ्री में इलाज
गाजीपुर। रंग बहादुर सिंह के चार बेटे हैं। इनमें सबसे बड़े बेटे जनार्दन और तीसरे नंबर के बेटे संतोष कुमार घर पर पिता के साथ औषधीय खेती करते हैं। जबकि दूसरे बेटे अशोक राष्ट्रीय स्तर के शूटिंग खिलाड़ी हैं। सबसे छोटे बेटे डॉ. मृत्युंजय सिंह वाराणसी में सर्जन हैं। वह हर सप्ताह घर आते हैं और लोगों का इलाज करते हैं। रंग बहादुर बताते हैं कि इसके बदले वह फीस नहीं लेते हैं।