विरवट कोन्हवलिया के सामने तेजी से कटान कर रही गंडक नदी।
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सेमरा एवं शिवरायकापुरा में मंगलवार को कटान तो धीमा रहा लेकिन 48 घंटे तक हुए भयावह कटान की दहशत से लोग घरों को खाली कर पलायन करने में लगे रहे। कटान में लगभग दो दर्जन रिहायशी मकान एवं कई झोपड़ियां गंगा में समाहित हो चुकी हैं। गांव को बचाने के लिए बना ठोकर भी साधु का डेरा के पास 260 मीटर बह गया है। सेमरा से शेरपुर जाने वाली मुख्य सड़क कटान की भेंट चढ़ जाने से दोनों गांवों का आपस में संपर्क टूट गया है। गांवों की बिजली आपूर्ति दो दिनों से ठप है।
2013 में शेरपुर, सेमरा सहित अन्य गांवों में हुए भीषण कटान में सैकड़ों मकान गंगा की धारा में बह गए थे। गांव को बचाने के लिए 23 करोड़ की लागत से गंगा के किनारे 1560 मीटर ठोकर का निर्माण कराया गया था। पिछले दिनों शेरपुर में आए सिंचाई एवं पीडब्लूडी मंत्री शिवपाल यादव ने सेमरा को बचाने के लिए गांव के दोनों तरफ 500 मीटर और ठोकर बनाने की घोषणा की थी। अभी वह ठोकर बना भी नहीं कि पूर्व के बने ठोकर का पश्चिमी भाग गंगा की धारा में विलीन होने के साथ ही अपने साथ दो दर्जन रिहायशी मकान एवं झोपड़ियां भी लेता गया।
तीन साल पहले अपना आशियाना गंवा चुके लोगों ने सुरक्षित स्थान मानकर शेरपुर सेमरा मार्ग के किनारे आवास बना लिया था। वहां से गंगा काफी दूर थी और ठोकर भी बन गया था। ऐसे में लोग अपने को सुरक्षित मान रहे थे। तीन वर्ष के भीतर देखते ही देखते गंगा ने सुरक्षित स्थान पर भी आकर दस्तक देना शुरू कर दिया। इस वर्ष ठोकर सहित कटान पीड़ितों की नई बस्ती भी गंगा में समा गई।
किनारे के लोग अपने घरों को उजाड़कर उसमें रखे सामान के साथ साथ ईंट, दरवाजा, खिड़की आदि उजाड़कर अपनी रिश्तेदारी या किसी सुरक्षित स्थान पर ले जाने में लगे हैं। सड़क के किनारे बसी दलित बस्ती के विरेंद्र राम अपना पक्का मकान खुद अपने हाथों से तोड़ने में लगे थे, वहीं भगवान, अच्छेलाल, विजय, आशीष, बुद्धिराम आदि अपने घरों को तोड़कर सामान निकालने में लगे थे। गांव का जच्चा-बच्चा केंद्र भी कटान की जद में आ गया है। किसी भी क्षण वह भी गंगा में विलीन हो सकता है। उसमें रहने वाले विस्थापित परिवार अब कहां जाएं यह कोई बताने वाला नहीं है। विद्युत के पोल एवं खड़ंजा भी कटान की भेंट चढ़ गया है। इससे गांव में बिजली आपूर्ति भी ठप हो गई है।