इस समय पूरे जिले में ‘का बर्षा जब कृषि सुखानी’ वाली कहावत चरितार्थ हो रही है। लोगों का कहना है जब सब कुछ बिगड़ जाएगा, तो बरसात होगी भी तो किस काम की। काफी दिनों से किसान बारिश की आस लगाए बैठे हैं। जिससे खेती का कार्य शुरू हो सके, लेकिन अब दिन बीतने के साथ खरीफ की खेती प्रभावित हो रही है।
आलम यह है कि अभी तक पूरे जिले में सिर्फ दस फीसदी धान की रोपनी हो पाई है, वह भी सूख रही है। आंकड़े बताते हैं कि एक लाख 56 हजार 629 हेक्टेयर में धान की खेती होती है। अब बरसात नहीं होगी तो किसानों को भारी नुकसान होगा। करीब 15 हजार हेक्टेयर भूमि में अभी तक धान की रोपनी हुई है, जिसमें से पांच हजार हेक्टेयर खेत लगभग सूख गए हैं।
जून के पहले सप्ताह में ही धान की खेती का काम शुरू हो जाता है। अब जबकि जुलाई माह का एक पखवारा भी बीत चुका है और धान बुआई की हालत बेहद खराब है। मानसून आने का समय भी जून का पहला माह ही होता है। जून और जुलाई में अब तक जिले में कोई खास बरसात नहीं हुई है। इस बार बरसात ने जबरदस्त धोखा दिया है। किसान निराश और हताश हैं।
काले बादल मंडरा कर उड़ जा रहे हैं। हर अगले दिन किसान अपने को सांत्वना दे रहा है। जिले में दो लाख 53 हजार हेक्टेयर खेती लायक भूमि है। जिसमें से दो लाख 17 हजार हेक्टेयर सिंचित है। इसमें एक लाख 56 हजार 629 हेक्टेयर में धान की खेती होती है। अब तक किसानों ने खेतों में महज 10 फीसदी धान की रोपाई की है।
इसमें से भी धान पानी के बिना सूख रहा है। सामान्य हालत में जुलाई माह में चारों ओर धान की बुआई के बाद खेतों में सिर्फ हरियाली ही हरियाली दिखती है, लेकिन जनपद में खेतों में धूल उड़ रही है। हालांकि जिन खेतों में बोआई हो गई है उनको बचाने की पूरी कवायद हो रही है। फसलों के ऊपर के भाग सूखने लगे हैं।
पत्तियां पीली दिखाई देने लगी हैं। यह देख किसानों का कलेजा बाहर आ जा रहा है। अगर पौधों की जड़ों में नमी बरकरार है तो उसको बताया जा सकता है। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि धान की रोपनी का आंकड़ा 10 फीसदी से अधिक नहीं कहा जा सकता है। लेकिन अवर्षण की यही स्थिति बनी रही तो किसानों को भारी नुकसान होगा।