मरदह। त्रेतायुग से मरदह स्थित महाहर धाम नाता है। यहां प्राचीन तेरह मुखी शिवलिंग स्थापित है। मान्यता है कि राजा दशरथ ने ब्रह्मा के आशीर्वाद से श्राप मुक्ति और पुत्र प्राप्ति के लिए यहां शिवलिंग की स्थापना और मंदिर का निर्माण कराया था। पूरे सावन माह मंदिर परिसर घंटों की आवाज से गुंजायमान रहता है। ऐतिहासिक-पौराणिक महत्व के कारण यह धाम आस्था और विश्वास का केंद्र है। यहां जलाभिषेक के लिए श्रद्धालुओं की सबसे अधिक भीड़ होती है।
पूरे पूर्वांचल सहित पड़ोसी राज्य के भी श्रद्धालु इस धाम पर पहुंचकर दुर्लभ शिवलिंग का दर्शन पूजन कर बाबा से मनचाही मुराद मांगते हैं। मंदिर प्रशासन के मुताबिक धाम में तेरहमुखी शिवलिंग के साथ ही शिव-पार्वती की युगल मूर्ति भी अद्भुत एवं पूजनीय हैं। कहा जाता है कि मंदिर के सामने उत्तर से दक्षिण तरफ दिशा में एक किलोमीटर तक लंबा सरोवर है, जहां हजारों वर्ष पहले इस स्थान पर मां गंगा का प्रवाह था। धाम परिसर में एक पोखरे हैं, जिके बारे में कहा जाता है यह वही पोखरा है जहां श्रवण कुमार जल लेने गए थे। तब श्रवण के माता-पिता ने दशरथ को श्राप दिया था। इसके बाद ब्रह्मा के आशीर्वाद से राजा दशरथ ने श्राप मुक्ति और पुत्र प्राप्ति के लिए शिवलिंग की स्थापना कर पूजन किया। यह महल दशरथ की गढ़ी के नाम से विख्यात है।