सर्वोच्च न्यायालय की रोक के बावजूद जिले में अवैध आरा मशीनों का संचालन हो रहा है। जिले में महज 67 आरा मशीनों कों लाइसेंस लेकिन 150 से ज्यादा जगहों पर धड़ल्ले से लकड़ी की चिराई हो रही है। यह खेल अफसरों के नाक के नीचे हो रहा है।
निगरानी नहीं होने के कारण तस्करी से लाई जाने वाली ज्यादातर लकड़ियों की चिराई अवैध मशीनों पर की जाती है। पुलिस प्रशासन और वन विभाग के अधिकारी इन मशीनों के बारे में जानते हैं लेकिन बगैर शिकायत के अपनी तरफ से कुछ नहीं करते। कोई शिकायत करते तो भी ज्यादा कुछ नहीं होता है। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 1997 तक स्थापित आरा मशीनों को वैध माना है।
इस आधार पर वन विभाग ने वर्ष 2006 में जिले की 67 आरा मशीनों को लाइसेंस जारी किया। अन्य आरा मशीनों को सीज कर दिया गया। अब तमाम आरा मशीनें अवैध तरीके से संचालित होने लगी हैं। मुहम्मदाबाद, बाराचवर, भदौरा, जमानिया और जखनिया क्षेत्रों में 40 से ज्यादा अवैध आरा मशीनें संचालित की जा रही हैं।
अवैध आरा मशीनों पर वन माफिया की ओर से तस्करी कर लाई जाने वाली लकड़ियों की चिराई कर मोटी रकम ली जाती है। विभागीय सूत्रों की मानें तो इसके एवज मेें पुलिस और वन विभाग हर माह मोटी रकम वसूल करता है। ऐसी आरा मशीनों की शिकायत होने पर विभाग के कर्मचारी छापा मारी से पहले ही मिल संचालकों को सूचित कर देते हैं और आनन-फानन में मशीनों के चक्के खोल कर अलग कर दिए जाते हैं। पिछले साल वर्ष एक व्यक्ति ने गोपनीय पत्र भेजकर इस मामले की शिकायत वन विभाग के मुख्य संरक्षक, इलाहाबाद से किया । शिकायत की जांच के लिए वाराणसी से टीम भेजी गई थी लेकिन उससे पहले ही सभी अवैध आरा मशीनें बंद कर दी गईं।
बीते कुछ माह पूर्व बाराचवर में छह अवैध आरा मशीनों की शिकायत मिलने पर इनको सीज कर दिया गया। अवैैध आरा मशीनें किसी भी सूरत में न चलने पाएं, इसके लिए वन रक्षकों और रेंजरों को कड़े निर्देश दिए गए है। - डा. एचराजा मोहन, डीएफओ
वर्ष 1980 तक जिले में कुल 117 आरा मशीनें थीं, जिन्हें वन विभाग की ओर से लाइसेंस जारी किए गए थे। सुप्रीम कोर्ट से गाइडलाइन तय होने के बाद 67 आरा मशीनों को वैध करार दिया गया और अन्य का लाइसेंस रद्द कर दिया गया। वैध आरा मशीनों का नवीनीकरण हो चुका है। मगर जिनके लाइसेंस निरस्त किए गए थे, उनमें अधिकांश पर आज भी लकड़ी की चिराई हो रही है।