औड़िहार। डाला छठ या सूर्य खष्ठी पर्व पूर्वी भारत में जन जागरण के साथ अटूट श्रद्धा और भक्ति का त्योहार है। यह पर्व लोगों को संदेश देता है कि उठो, जागो और अपने अभियान में जुट कर प्रकृति की शक्ति को पहचानो। व्रती महिलाओं के हृदय का भाव भोर और संध्या के वक्त उनके गीतों में प्रस्फुटित होकर लोगों को प्रसन्नता प्रदान करता है। फल-फूल और प्रसाद से भरी उनकी दौरी तथा पूजन और शृृंगार से भरी सुपली लेकर जब वह गाती हैं कांचे ही बसावा के हरियर बहंगी, बहंगी लचकत जाए। यह गीत संदेश देता है कि आसमान में उगने वाले सूर्य की इंद्रधनुषी छटा को व्रती स्वयं में प्रकृति को जनमानस के बीच लाकर खड़ा कर दिया है।
इसी तरह केलवा के पात पर उगेला सूरज मल झांके झुके, उगा हे सुरुज मल भेल भिनसरवा, अरग के होले बेर पूजन के होले बेर हो। कोपी कोपी बोलेली सूरज देवा अरग के बेर पटना के घाट पर नरियर्र, अंगना में पोखरी खनाईब। खरना के दिन से ही छठ मैया का विविध पकवानों वाला प्रसाद जिस वक्त बनता है, उस वक्त घर की सारी महिलाएं इकट्ठा होकर गीत गाती हैं। आज सुहागन की रात, ओ चंदा धीरे उगो। वास्तव में छठ पर्व में प्राकृतिक भौतिक आध्यात्मिक एवं शारीरिक मानसिक भाव का पूरी तरह समावेश है। जलधार इसकी महत्ता है। इस पर्व में उगते हुए सूर्य तथा डूबते हुए सूर्य को अर्घ देते हुए वक्त हम अपने तथा अपने पूरे परिवार के स्वास्थ्य की कामना और हर तरह के कल्याण की कल्पना करते हुए जलधार में जल पुंज गिरा कर पुण्य का भागी बनते हैं। जलधार में गीत गाते हैं छठ मैया और सूर्य देव का सुमिरन करते हैं तथा इस व्रत को पूरा कर अपने को धन्य समझते हैं। तीन दिन तक इस पर्व पर सुबह शाम और रात्रि को होने वाला गीत पूरे वातावरण को भक्ति से विभोर करता है। डाला छठ पर पूर्वांचल की माटी में गीत महकते जान पड़ते हैं। इन गीतों से त्योहारों और पर्वों की महत्ता समरस होकर भक्ति का न केवल अद्भुत संचार कराती है, बल्कि उस पर्व के अवधारणा को भी प्रदर्शित करती है।