स्थानीय विकास खंड में कटान का कहर पिछले चार साल से जारी है। इससे तटवासी भी दहशत में हैं। नदी उपजाऊ भूमि को काटती हुई आबादी के काफी करीब पहुंच गई है। इससे कटान के मुहाने पर बसे बयेपुर और सोकनी गांव के दर्जनों परिवारों की रात की नींद और दिन का सुकून छिन गया है। कमोबेश यही स्थिति बड़हरियां तथा रफीपुर गांव की है। हालांकि वर्तमान में कटान की रफ्तार काफी धीमी है, लेकिन निरंतर उपजाऊ भूमि के कटने और नदी के कदम बढ़ाने से खतरा मंडराता नजर आ रहा है। कटान से चार गांव के करीब 1000 से अधिक किसानों की खेती कटान से तबाह हो चुकी है।
करंडा विकास खंड के बयेपुर, सोकनी, बड़हरिया तथा रफीपुर गांव में कटान से तटीय किसानों की बचैनी बढ़ गई है। करीब ढाई किमी के क्षेत्रफल में नदी का कटान जारी है। नदी के तटवर्ती इलाके में किसानों ने अरहर, ज्वार तथा गन्ना की खेती की है। इतना ही नहीं सब्जी की खेती भी प्रभावित हो रही। बयेपुर को छोड़कर तीन गांवों में पिछले चार साल से कटान जारी है।
कटान में अब तक सैकड़ों एकड़ भूमि कट कर नदी में समाहित हो चुकी है। कटान का दर्द बयां करने वाले किसानों में बयेपुर के ग्राम प्रधान रामअवतार राम, लक्ष्मण यादव, बोधा, प्रेम शंकर, श्यामदेव, उमानाथ, होशिला, जीउती, राजदेव, कैलाश, विलोचन, पद्मदेव तथा बेचू शामिल हैं। इन किसानों ने बताया कि चार साल में इलाके की करीब 200 एकड़ से अधिक उपजाऊ भूमि नदी में समाहित हो चुकी है। आज भी कटान को रोकने के लिए कोई स्थायी हाल नहीं निकाला जा सका है।
उधर कटान के मुहाने पर बसे कसेरा गांव के हमिदुल्लाह, वकील खां, सम्सुद्दीन खां, इफ्तेखार खां, मेराज खां, बादशाह खां, इम्तियाज, मुकीर खान आदि ने बताया कि कटान को रोकने के लिए काफी दिनों तक आंदोलन किया गया। कटान पीड़ितों ने गांवों तथा उपजाऊ भूमि को बचाने के लिए जिला प्रशासन तथा शासन से मांग की, लेकिन पिछले चार साल में कटान रोकने के नाम पर कोई कार्य नहीं कराया गया। नेतागण केवल आश्वासन की घुट्टी पिलाते रहे। कटान पीड़ितों का कहना है कि अगर शासन और प्रशासन समय रहते नहीं चेता तो आने वाले समय में कई गांव अस्तित्व विहीन हो जाएंगे।