सिद्धपीठ हथियाराममठ पर पिछले दो माह से चल रहे चातुर्मास महानुष्ठान के साथ ही पिछले एक सप्ताह से चल रहे श्रीमद्भगवद् कथा की पूर्णाहुति शुक्रवार को सिद्धपीठ के ब्रह्मलीन महामंडलेश्वर श्री बालकृष्ण यति जी महाराज के साथ ब्रह्मलीन संत महात्माओं को श्रद्धांजलि अर्पित करके की गई।
चातुर्मास यज्ञ के पूर्णाहुति के अवसर पर महामंडलेश्वर भवानीनंदन यति ने कहा कि आम तौर पर शिष्य श्रद्धालु संत महात्माओं के चरण वंदन के लिए लालायित रहते हैं। जबकि शिष्य समाज को संत के चरण नहीं वरन संत कते आचरण को पकड़ना चाहिए। संत महापुरुषों के आचरण के अनुकरण से ही व्यक्ति देश समाज का कल्याण संभव है। इसके साथ ही उन्होंने उपस्थित लोगों से मठ परिसर के साथ ही अपने घर समाज व आस-पास साफ -सफाई का संदेश देते हुए सफाई के प्रति जागरूक किया। हरिद्वार से आए वरिष्ठ संत महामंडलेश्वर स्वामी मोहनानंद यति ने कहा कि सिद्धपीठ की 650 वर्ष प्राचीन परंपरा से समूचा अध्यात्म जगत नतमस्तक नजर आता है। कथावाचक श्यामसुन्दर "ठाकुर जी" महाराज ने कहा कि वसंत के आने से प्रकृति का सुधार होता है, संत के सानिध्य में आने से संस्कृति का सुधार हो जाता है। इसीलिए शास्त्रों में भी कहा गया है की वृक्ष, सरिता, पर्वत, धरती और संत मानव कल्याण के निमित्त ही इस धरती पर आते हैं। इस दौरान मालिनी अवस्थी ने भी गीत प्रस्तुत किया।
जूना अखाड़े के वरिष्ठ महामंडलेश्वर परेसानंद यती ने कहा की बड़े ही पुण्य कर्म और प्रभु की कृपा से मानव शरीर प्राप्त होता है। मानव जीवन में व्यक्ति की संगति का बहुत ही महत्व होता है। ऐसे में साधु-संत विद्वानों की संगत से जीवन धन्य और स्वर्ग के सामान हो जाता है। हमारी संत और शिष्य परंपरा विश्व की अलौकिक और अनूठी परंपरा है। महामंडलेश्वर स्वामी सोमेश्वरयतिजी महाराज ने कहा-जीवों के लिये मनुष्य शरीर का प्राप्त होना दुर्लभ है। गुरु इस संसार सागर से पार उतारने वाले है । सिद्धपीठ के वरिष्ठ ब्रह्मचारी संत एवं प्राचार्य रत्नाकर त्रिपाठी ने आगंतुकों के प्रति आभार जताते हुए सभी संत महात्माओं का अभिवादन किया। इस अवसर पर सत्यानंदजी, अभयानंद जी, आचार्य अवनीश, वैदिक आदि मौजूद रहें।