यहां सीमा का निर्धारण ऐसा है कि तलासपुर तिराहा से ककरैत तक की करीब पांच किमी लंबी सड़क चंदौली और गाजीपुर जिले की सीमा को साझा करती है। इसी का फायदा तस्कर उठाते हैं। सीमा विवाद से बचने के लिए पुलिस इनको नहीं रोकती या फिर यूं कह सकते हैं कि पुलिस यहां पर दिखती ही नहीं है।
ककरैत में कर्मनाशा नदी के पुल के उस पार बिहार के वन विभाग की चेक पोस्ट है, उससे करीब 200 मीटर आगे नुआंव में गायों, बछड़ों और सांड़ों को रखा जाता है। बेहद कमजोर गाय बछड़ों के साथ यहां मौजूद लोगों का कहना था कि वह व्यापारी हैं, यहां पशु खरीदने आते हैं।
वहां भूखे पेट बंधे किसी गोवंश के पैरों में चोट के निशान थे तो किसी के शरीर पर गाड़ी में ढूंसने पर लगी रगड़। कुछ गायों के कान पर टैग भी लगा था, जो कि बीमा करते समय कंपनी की ओर से लगाया जाता है। यहीं के एक व्यक्ति का कहना था कि वह स्वस्थ्य पशु को ही खरीदते हैं, बाकी बंगाल और बिहार के कसाई ले जाते हैं। अब ये पशु कहां से आते हैं, कौन लाता है, इस सवाल पर सब चुप्पी साध गए और धीरे-धीरे वहां से चले गए।
बिहार सीमा स्थित नुआंव में बंधे पशु।
- फोटो : अमर उजाला
सैदपुर से मवेशी बिहार तक पहुंचावे पर 12 से 13 हजार रुपया मिल जाला
बिहार राज्य से गाजीपुर जिले की सीमा साझा होती है। पुलिस से बचने के लिए पशुओं को एक-एक करके जमानिया तक पहुंचाया जाता है। इसके लिए अलग-अलग रास्ते हैं। तस्करों के साथ काम कर चुके बबलू ने बताया कि - करंडा से एक पशु बिहार जहां मेला लागे ला, वहां पहुंचाए पर 3500 रुपये मिलेला।
अगर दो मवेशी पहुंचावे के मिलल त सात हजार मिल जाइए। 24 घंटा में तीन चक्कर कईल जाला। अगर सैदपुर से मवेशी बिहार तक पहुंचावे पर 12 से 13 हजार रुपया मिल जाला। बिहार में मेला से ट्रक पर मवेशी कलकत्ता भेजल जाला। अब त इ काम छोड़के दूसरे वाहन चलाकर परिवार क भरण पोषण करत हई। युवक का कहना था कि अब रेट बढ़ गए हैं।
बिहार में यही पशु 30 से 40 हजार रुपये में बेचा जाता है। आगे जाने पर उसकी कीमत और बढ़ जाती है। पुलिस से बचने के लिए फर्जी कागज भी तैयार रखे जाते हैं। जिस थाना क्षेत्र में सख्ती कम होती है, वहां पर दिन में भी पशुओं को उठाया जाता है।
गहमर में तो दिन में भी हो रही तस्करी
गहमर क्षेत्र में पहले रात में छोटे वाहनों पर पशुओं को लादकर तस्कर अपने ठिकानों तक पहुंचाते थे। मगर अब गांवों व कस्बों से पशुओं को चुराकर खेतों और जंगल के रास्ते इनको एक जगह इकट्ठा किया जाता है। फिर एक-एक करके पिकअप से ढोया जाता है। कोतवाली क्षेत्र के बारा व देवल इलाके बिहार प्रांत की सीमा से जुड़े हैं। इसका लाभ पशु तस्कर उठाते हैं।
यहां खुलेआम राष्ट्रीय राजमार्ग 124 सी (ताड़ीघाट-बारा मार्ग) से पशु लदे वाहन गुजरते रहते हैं। गाजीपुर के गोसंदेपुर के धीरेंद्र सिंह ने बताया कि तस्कर मोटरसाइकिलों से पशु लदे वाहनों के आगे-आगे चलकर पुलिस की लोकेशन बताते हैं। पुलिस की सख्ती होने या पीछा होने पर तस्कर पशु लदे वाहनों को गांवों में घुसा देते हैं और वाहन पर लदे पशुओं को नीचे उतार कर बांध देते हैं।
गाजीपुर में 32 व आजमगढ़ में 33 तस्कर
पुलिस के मुताबिक पूर्वांचल के नाै जिलों में 1564 पशु तस्कर चिह्नित किए गए हैं। जाैनपुर में सबसे ज्यादा 570 हैं। चंदाैली में 427, भदोही में 199, मऊ में 168, मिर्जापुर में 50, सोनभद्र में 48, बलिया में 37, गाजीपुर में 32 और आजमगढ़ में 33 पशु तस्कर हैं। वाराणसी जिले में एक भी पशु तस्कर चिह्नित नहीं है।
स्थानीय पुलिस का कहना है कि यहां पर अब तक बाहरी जिलों के ही पशु तस्कर पकड़े गए हैं। जनवरी 2025 से लेकर अब तक 371 तस्करों की गिरफ्तारी हो चुकी है, मगर इन तस्करों के गांव-गांव और कस्बों-कस्बों में सक्रिय नेटवर्क पर खास असर नहीं पड़ता है।
बोले अधिकारी
रेंज के सभी थानाध्यक्षों को स्पष्ट निर्देश है कि पशु तस्करों की गिरफ्तारी ही नहीं, उसके नेटवर्क को खंगाल कर मास्टरमाइंड तक पहुंचें। उसके खिलाफ गैंगस्टर एक्ट की कार्रवाई भी करें। यदि इसमें पुलिस की संलिप्तता उजागर हो तो उसके खिलाफ भी उसी तरह की कार्रवाई करें। - वैभव कृष्ण, डीआईजी रेंज वाराणसी
बिहार सीमा स्थित नुआंव में बंधे पशु।
- फोटो : अमर उजाला
सांड़ की सबसे ज्यादा तस्करी
पूर्वांचल में सबसे ज्यादा तस्करी सांड़ की होती है। इसके बाद बैल, गाय और बछड़े की होती है। जानकारों के अनुसार, पशुओं की खरीद ताैल के हिसाब से होती है। मतलब जिस पशु का वजन ज्यादा होगा, उसकी कीमत उसी हिसाब से तय होती है। तस्करों के निशाने पर दुधारू पशु होते हैं।
n पुलिस पर भी हो रहे हमले : पुलिस झारखंड के गढ़वा जिले के बदरे आलम को गो तस्करी का माफिया घोषित कर चुकी है। पिछले वर्ष तस्करों के हमले में एक पुलिसकर्मी की मौत गई थी। जाैनपुर में पुलिस पर दो हमले हो चुके हैं। पिछले दिनों हेड कांस्टेबल को पिकअप सवार पशु तस्करों ने कुचलकर मार डाला था। गाजीपुर में पुलिस पर सात और वाराणसी में चार बार हमले हो चुके हैं।
जायलाजीन इंजेक्शन का हो रहा इस्तेमाल
तस्कर पशुओं को बेहोश करने के लिए जायलाजीन का इंजेक्शन लगाते हैं। इसका इस्तेमाल चिकित्सक पशुओं का इलाज करने के लिए करते हैं। इसकी डोज भी तय होती है। मगर तस्कर पूरा इंजेक्शन लगा देते हैं, जिसकी वजह से पशु बेसुध हो जाता है। यह स्थिति कई घंटे तक रहती है।
इसके बाद लग्जरी कारों या अन्य वाहनों में पशुओं को ठूंसकर भर दिया जाता है। पशु कोई हलचल नहीं करता है और तस्कर उनको ठिकाने तक पहुंचा देते हैं। कभी-कभी ओवरडोज के कारण पशु की माैत हो जाती है। यह इंजेक्शन बाजार में आसानी से उपलब्ध है।