औड़िहार। गंगा और गोमती से घिरे गांव खरौना की हालत सबसे दयनीय बनी हुई है। करीब पांच हजार की आबादी वाले इस गांव के लोग शासन -प्रशासन से सहायता पाने का इंतजार कर रहे हैं। घर बार छोड़ कर अधिकतर लोग सड़कों पर आ गए हैं। सबसे बदहाल स्थिति मलहिया बस्ती की है। यहां शाम होते ही अंधेरा छा जाता है। कहीं पशुओं के बह जाने का डर तो कहीं घर के लोगों के साथ अनहोनी की आशंका। ऊपर से विषैले सांप, बिच्छू आदि जीव जंतु इधर उधर निकल रहे हैं, जिसका खतरा बना हुआ है। बाढ़ से रिहायशी झोपड़ियां और उसमें रखा सामान बर्बाद हो गया है।
जिला प्रशासन ने बाढ़ पीड़ितों के लिए बाढ़ राहत केंद्र बनाया है, लेकिन बस्ती सें दूर होने के नाते पशु आदि लेकर वहां कैसे जाएं, यह परेशानी सामने आ रही है। बाढ़ से फसलें तो पहले ही बर्बाद हो गई है, अब घर में रखा अनाज भी नही बचा है। कई घरों में चूल्हे जलने के लाले पड़े हैं। मिट्टी का तेल तक नसीब नहीं है। पानी गांव की बस्ती को चपेट में ले लिया है। बस्ती में रखे गये गोबर और उपले सड़ कर सड़ांध पैदा कर रहे हैं। बस्ती में संक्रामक रोगों के फैलने का खतरा बना हुआ है। पीने के स्वच्छ जल का पूर्णतया अभाव है। शासन ने अभी तक इस बस्ती के लोगों की सुधि नहीं ली है। गांव की धर्मा देवी, बगेसरा देवी, रेशमा, गंगा यादव, धनंजय, सुभाष, रमापति, उर्मिला, चंद्रा, ज्योति, चंपा प्रशासन को कोस रही है। इन लोगों का कहना है कि सरकार कुछ राहत सामग्री नहीं दे रही है। मलहिया बस्ती की उषा निषाद व उनके पति सुभाष निषाद, इमरती देवी बताती है कि दो दिन से उनके घर चूल्हे नहीं जले हैं। छोटे बच्चों को लाई खिला कर रखा जा रहा है। निशा और मनोज कुमार कहते हैं कि पूरा गांव तीन ओर से पानी से घिर चुका है। गांव के वीरेंद्र सिंह और लाल बहादुर यादव अधिकारियों के आश्वासन को छलावा बताते हुए कहते हैं कि बाढ़ जैसी आपदा के वक्त गरीबों व पीड़ितों को नजर अंदाज करना ना इंसाफी है।