मकर संक्रांति का पर्व गुरुवार को उमंग और उत्साह के साथ मनाया गया। भोर
से ही गंगा स्नान के लिए श्रद्धालुओं का तटों पर पहुंचना शुरू हो गया था।
स्नान के बाद पूजन-अर्चन कर लोगों ने ब्राह्मणों एवं गरीबों को दान दिया।
बच्चों एवं युवाओं ने मैदानों तथा घर की छतों से जमकर पतंगबाजी की। बदली
छाई रहने के बाद भी बच्चे और युवा पतंग उड़ाने में लगे रहे। बाद में लोगों
ने दही-चूड़ा के साथ खिचड़ी खाई।
मुर्हुत के अनुसार शहर सहित ग्रामीणों
क्षेत्रों के अधिकांश लोगों ने गुरुवार को मकरसंक्रांति का पर्व मनाया। पौ
फटते ही स्नान के लिए लोगों के पांव गंगा घाटों के लिए बढ़ने लगे। कड़ाके
की ठंड भी आस्था में बाधक नहीं बनी। इसकी परवाह किए बगैर लोगों ने घाटों पर
पहुंचकर गंगा स्नान किया।
इसके बाद पूजन-अर्चन किया। लोग गरीबों और
ब्राह्मणों को दान कर पुण्य के भागी बने, जो लोग गंगा घाटों तक नहीं जा
सके, उन्होंने घर में स्नान कर पूजा-पाठ कर परिवार के सुख-समृद्धि की कामना
की। इसके बाद लोगों ने लाई-चूड़ा, लाई, गट्टा, गजक, दही का सेवन किया। शाम
को सभी घरों में खिचड़ी बनाई गई।
परिवार के लोगों ने खिचड़ी का सेवन करने
के साथ ही अधिकांश लोगों ने इसका वितरण पास-पड़ोस के लोगों में किया। सुबह
से गंगा का जो सिलसिला शुरू हुआ वह दोपहर तक जारी रहा। कड़ाके की ठंड के
बाद भी बच्चों एवं बड़ो ने मकान की छतों, गंगा किनारे और मैदान में
पतंगबाजी का आनंद उठाया।
पतंगों के आसमान में पेंच लड़ाने के दौरान नीचे
खड़े बच्चे उसे निहारते रहे। जैसे ही पतंग कट रही थी, उसे अपना बनाने के
लिए बच्चे दौड़ पड़ रहे थे। पंतग लूटने के दौरान बच्चों में छीना-छपटी के
चलते पतंग फट भी जा रही थी।