जिले में करीब 50 वर्षों से चल रहे बीड़ी उद्योग को सरकार की ओर से बढ़ावा नहीं मिलने के चलते उद्योग बंद होने के कगार पर पहुंच चुका है। बीड़ी बनाने के लिए मध्य प्रदेश के जंगलों से तेंदू का पत्ते सरकारी दर पर उद्यमियों को मिलते
हैं। एक तरफ जहां उद्यमी मंदी के दौर से गुजर रहे हैं वहीं इस धंधे से जुड़े मजदूरों को एक हजार बीड़ी बनाने पर सिर्फ 60 रुपये मजदूरी मिलती है। हजारों परिवार कई पुश्तों से बीड़ी बनाने का काम करते आ रहे हैं।
बीड़ी बनाने के लिए उद्यमी अन्य जिलों के ठेकेदारों से तेंदू के पत्ते बोरी के हिसाब से खरीदते हैं। शासन स्तर पर इस उद्योग को बढ़ावा नहीं मिलने से धीरे-धीरे इस उद्योग का दायरा पूरी तरह से घट चुका है। कई वर्षों पहले जिले के ग्रामीण
क्षेत्र में रहने वाली महिलाएं अपने घरों में बीड़ी बनाने का काम करती थीं। जिससे उनके घर का खर्च चलता था। उस समय बीड़ी की मांग और खपत भी ज्यादा होती थी। बीड़ी उद्योग से जुड़े तुलसीपुर स्थित काजी मंडी निवासी उद्यमी
इश्तेयाक अंसारी ने बताया कि सरकार की ओर से इस उद्योग को बढ़ावा देने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। बीड़ी की मांग होने से गरीबों को भी रोजगार आसानी से मिल जाता था। गरीब परिवार की महिलाएं घर में रहते हुए बीड़ी
बनाने का काम करती थीं लेकिन सरकार की ओर से इस ध्यान नहीं देने के कारण उद्योग पूरी तरह घाटे के साथ ठप होने के कगार पर पहुंच चुका है।
जिले में बिजली की व्यवस्था ठीक नहीं होने के चलते नगर क्षेत्र के बुनकरों को फांकाकसी का शिकार होना पड़ रहा है। बुनकर रोजगार की तलाश में अन्य देशों की ओर पलायन कर रहे हैं।
बुनकर अब्दुल रसीद अंसारी ने बताया कि हाथ से बुनाई की गई साड़ियों की मांग अब बहुत ही कम हो चुकी है। इसके चलते साहूकार कम साड़ियों की बुनाई करवा रहे हैं। जिससे परिवार के लोगों का पालन-पोषण कर पाना संभव नहीं हो पा
रहा है। बुनकर इश्तेयाक अंसारी एवं मैनुद्दीन अंसारी का कहना है कि साड़ी बुनाई की मजदूरी पहले 80 रुपये मिलती थी लेकिन मांग कम होने के चलते अब बुनाई की मजदूरी 40 रुपये ही मिलती है। नेसा अंसारी, तसौवर अली एवं हेसामुद्दीन
ने बताया कि जीविका ठीक से नहीं चलने के कारण बुनकर अपने तथा परिवार का भरण-पोषण करने के लिए खाड़ी देशों की ओर पलायन कर रहे हैं।