जमानिया। मुहर्रम की पहली तारीख पर कस्बे में भव्य अखाड़ा जुलूस निकाला गया। इसमें बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक की सहभागिता देखने को मिली। जुलूस कस्बा बाजार होते हुए सैयदबाड़ा चौक तक पहुंचा, जहां कार्यक्रम का समापन हुआ। इस दौरान अखाड़े के कलाकारों ने हैरतअंगेज जंगी जौहर दिखाकर लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। करतबों में बनेठी, ढाल, लाठी और डंडे का प्रदर्शन किया गया, जो लगभग 50 वर्षों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है।
जुलूस देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़े और जगह-जगह लोगों ने उसका इस्तकबाल किया। नगर पालिका परिषद ने जुलूस मार्ग पर साफ-सफाई, चूने का छिड़काव और पेयजल व्यवस्था की पुख्ता व्यवस्था की थी। मुस्लिम समाज ने कर्बला के मैदान में हजरत इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हुए गम और अकीदत का इजहार किया। नेसार अहमद खान वारसी, आरिफ खान वारसी, हयातुल्ला खान वारसी, दानिश मंसूरी, शाहिद जमाल मंसूरी सहित मौलाना तनवीर रजा ने जानकारी दी कि मुहर्रम की शुरुआत के साथ ही जुमे की शाम से फातेहा पढ़ने और रोशनी करने का सिलसिला शुरू हो गया है, जो 10 दिनों तक चलता रहेगा। महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों की भारी भीड़ इमाम चौक पर उमड़ पड़ी, जहां ताजिया की हूबहू शक्ल में रोजा ए मुबारक की नकल तैयार की गई। यह परंपरा भी वर्षों से चली आ रही है। बताया गया कि भारत के तत्कालीन शासक तैमूर लंग ने इस्लामिक इतिहास की प्रेरणा लेकर ताजिया निर्माण की शुरुआत की थी। हजरत मोहम्मद साहब के नवासे हजरत इमाम हुसैन ने अपने 72 साथियों के साथ कर्बला की जंग में शहादत दी थी, जिसे मुहर्रम की 10वीं तारीख रोजा ए आशूरा के रूप में याद किया जाता है। यह महीना मुस्लिम समाज में गम के तौर पर मनाया जाता है। इस मौके पर हिंदू समुदाय के लोगों ने भी बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई और सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश की। मुहर्रम का यह अखाड़ा जुलूस न सिर्फ धार्मिक श्रद्धा का प्रतीक बना, बल्कि सामाजिक एकता का संदेश भी देता रहा।