गाजीपुर। प्रेमचंद विश्व के तीन शीर्षस्थ उपन्यासकारों में से एक हैं। ये बाल्जाक और टालस्टाय की श्रेणी में आते हैं। प्रेमचंद ने रंगभूमि और गोदान नहीं लिखी होती तो सामान्य श्रेणी के उपन्यासकार रह जाते। यह बातें डा. पीएन सिंह ने समकालीन सोच परिवार की ओर से प्रेमचंद जयंती की पूर्व संध्या पर गौतम बुद्ध कालोनी में आयोजित संगोष्ठी में कहीं।
अध्यक्षता करते हुए उन्होंने कहा कि वह जितना गांधीवादी थे उतना ही मानवतावादी भी। हिंदी साहित्य के सारे विमर्शात्मक आयाम प्रेमचंद में विद्यमान हैं। हिंदी साहित्य में जिन्हें भी लेखन करना है वह प्रेमचंद को पढ़कर ही आगे बढ़ सकते हैं। भारतेंदु और प्रेमचंद ही हिंदी भाषा के दो ऐसे साहित्यकार हैं, जिन्होंने लेखन को नई दिशा दी है। रामावतार ने कहा कि अंतिम समय में गंभीर बीमारी से पीड़ित रहते हुए भी गोदान जैसे कालजयी उपन्यास को पूरा किया। डॉ. समर बहादुर सिंह कहा कि अगर यह कहा जाए कि गांधी से भी आगे जाकर प्रगति चेतना को नई धार देने का उन्होंने भरपूर प्रयास किया है तो गलत नहीं होगा। डॉ. रामनारायण तिवारी ने कहा कि लॉर्ड कार्नवालिस ने जो नव सामंतवादी समाज बनाया था, उससे दबे हुए लोगों का प्रेमचंद ने प्रतिनिधित्व तो किया लेकिन भारतीय लोक की साझी संस्कृति से अछूते रहे। संगोष्ठी में डॉ. गजाधर शर्मा ‘गंगेश’, डॉ. धर्मनारायण मिश्र, डॉ. बालेश्वर विक्रम, कन्हई राम, डॉ. रामबदन सिंह, अमितेश सिंह, डा. बद्री सिंह, माधव कृष्ण एवं जितेंद्रनाथ घोष ने विचार व्यक्त किया। गोष्ठी में डॉ. बद्री सिंह, रश्मि शाक्या और पूजा राय ने काव्य पाठ किया। इस मौके पर अनिल कुशवाहा, प्रमोद राय, मु. इरफान, मनोज राय, धर्मेंद्र कुमार उपस्थित थे। संचालन माधव कृष्ण ने किया।