गाजीपुर। स्कूली वाहनों से लगातार हो रहे हादसों के बाद भी प्रशासन की आंख नहीं खुलती। जांच के नाम पर बस खानापूर्ति भर कर ली जाती है। जिले में करीब सवा सौ से अधिक स्कूल-कॉलेज ऐसे हैं जहां बस, टेंपो, मैजिक आदि से छात्रों को लाने-ले जाने का काम किया जाता है। इन वाहनों के लिए जो मानक तय हैं उनका पालन नहीं किया जाता है। इसमें अधिकतर वाहन खटारा और खस्ताहाल हैं। इसके चलते बच्चों की जान खतरे में पड़ी रहती है। यही नहीं इन वाहनों में क्षमता से अधिक बच्चों को भी लादा जाता है। रोजाना ऐसे वाहन सुबह शाम पुलिस कर्मियों की आंख के सामने से गुजरते है लेकिन पुलिस है कि वह आंखें मूंदे हुए हैं।
जिले भर में करीब सवा सौ से अधिक कांवेंट, पब्लिक स्कूल तथा शिक्षण संस्थाएं हैं, जिनके छात्र-छात्राएं स्कूली वाहनों से आते-जाते है। इनमें से करीब पचास संस्थाएं ऐसी हैं, जिनके पास अपने वाहन है। पचास फीसदी से अधिक संस्थाओं ने प्राइवेट तथा बाहरी गाड़ियों को ही इस काम के लिए रखा हुआ है। परिवहन विभाग के आंकड़ों की मानें तो करीब सात सौ वाहन स्कूली कार्य के लिए पंजीकृत हैं लेकिन मौके पर कई अन्य गाड़ियां प्रयोग में लाई जा रही हैं। इसमें से पचास फीसदी गाड़ियां पुरानी दिखाई देती हैं। कुछ बसों को छोड़ दिया जाय तो किसी भी वाहन में इमरजेंसी गेट नहीं है। वाहनों में अग्निशमन यंत्र या फर्स्ट एड बाक्स भी होना चाहिए, इसकी जानकारी तक चालकों को नहीं है। मैजिक, जीप आदि छोटे कई चार पहिया वाहन हैं, जिसके चालक नाबालिग हैं और उनके पास ड्राइविंग लाइसेंस तक नहीं है। यही नहीं जिन छोटे वाहनों में 10 बच्चों के बैठने की क्षमता है, उसमें 15 से 20 बच्चों को बैठाया जाता है। बच्चों को लेकर इस प्रकार के वाहन रोजाना सड़कों पर दिखते हैं लेकिन पुलिस कर्मी इसकी अनदेखी कर देते हैं। हालांकि हादसों के बाद प्रशासन की तरफ से कभी-कभी सख्ती की जाती है। अभी हाल ही में जिले में अभियान चलाकर स्कूली वाहनों की जांच की गई। इस दौरान 40 स्कूली वाहनों एवं टेंपो चालकों का लाइसेंस न होने पर चालान करते हुए जुर्माना वसूल किया गया था। वाहनों में क्या मानक होना चाहिए इसकी जानकारी भी दी गई लेकिन एक सप्ताह बाद ही स्थिति जस की तस दिखाई देने लगी।
स्कूली स्तर पर जांच का अभियान चलाया गया है। वाहनों के फिटनेस से लेकर चालक के डीएल तक को दुरुस्त कराने के बाबत संस्थाओं के जिम्मेदार लोगों नोटिस दिया गया है। क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाने वाले वाहनों और कंडम वाहनों की जांच कर संबंधित के खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। - राम सिंह यादव, एआरटीओ
मानकों पर ध्यान नहीं देते स्कूल
गाजीपुर। स्कूली वाहनों के लिए शासन-प्रशासन की ओर से कुछ मानक तय किया गया है जिस पर ध्यान नहीं दिया जाता है। इस लापरवाही का ही कारण है कि आए दिन हादसे होते रहते हैं। स्कूल वाहन दस वर्ष से पुराने नहीं होने चाहिए तथा समय-समय पर फिटनेस की जांच होनी चाहिए। बड़े वाहनों में इमरजेंसी गेट तथा छोटे वाहनों के दोनों तरफ द्वार होना चाहिए। हर समय अग्निशमन यंत्र तथा फर्स्ट एड बाक्स मौजूद रहे। चालक के साथ ही सहायक के पास भी डीएल होना चाहिए। जिला यातायात निरीक्षक सुधीर त्रिपाठी ने बताया कि इन मानकों के आधार पर स्कूली वाहनों की सख्ती से जांच की जा रही है। कई को नोटिस दिया गया है।
अधिक बच्चों के लिए स्कूल बनाते हैं दबाव
गाजीपुर। स्कूली वाहन के चालक शिवकुमार ने कहा कि कभी-कभी क्षमता से अधिक बच्चों को लादना पड़ता है इसके लिए स्कूल दबाव बनाता है। रूट निर्धारित होता है इसलिए बच्चों को लेना पड़ता है। कम जगह में छात्रों को बैठने में भी असुविधा होती है। मार्टिंस पब्लिक स्कूल के प्रधानाचार्य प्रदीप उपाध्याय ने बताया कि उनके स्कूल में एक बस सहित कुल चार वाहन हैं जो नए हैं। चालकों का नाम-पता पंजीकृत है। सभी वाहनों की नियमित जांच होती है। मानकों का पूरा ख्याल रखा जाता है। बच्चों की सुरक्षा हमारे लिए सर्वोपरि है। बाल विद्या मंदिर दाउदपुर के प्रबंधक अभय नारायण ने कहा कि स्कूली वाहन के चालक बदलते रहते हैं। हम उनकी पूरी जानकारी रखते हैं। प्रशासन की ओर से जारी नियमों का पालन हो रहा है।