दुबिहां। संत खड़ेश्वरी बाबा की प्रेरणा से शुरू हुई दुबिहां की रामलीला के बारे में दावा किया जा रहा है कि वहां लीला का मंचन 120 वर्षों से हो रहा है। खास बात यह है कि कभी लालटेन और पंचलाइट की रोशनी में होने वाली यह रामलीला अब बिजली की चकाचौंध में होती है। इसके बावजूद लोग परंपरा का निर्वाह पूरे उत्साह के साथ लीला मंचन के पौराणिक स्वरूप बनाए हुए है।
नवरात्र की सप्तमी से शुरू होने वाली यह लीला नारद मोह से राम राज्याभिषेक तक अनवरत चलती है। पात्र दोहा चौपाई के साथ लोगों को अपने अभिनय कौशल से बांधे रहते हैं। एक दशक से दशरथ की भूमिका निभाने वाले दुबिहां निवासी अशोक पांडेय का कहना है कि जब वह किरदार में होते हैं तो भाव विभोर हो जाते हैं। इस मंचन की बदौलत ही दो भोजपुरी फिल्मों में उन्हें छोटी भूमिका मिल चुकी है। उनके पुत्र कपड़ा व्यवसायी चंदन पांडेय हर वर्ष राम की भूमिका निभाते आ रहे हैं। बयोबृद्ध उदयनारायण राय का कहना है कि पहले मुकुट बांस के सुपेलो से तैयार किया जाता था। पात्रों के साजसज्जा के लिए हल्दी, चूना, चंदन तथा काजल का प्रयोग होता था। रामलीला में गांव के मुश्लिम समुदाय के नजीर अहमद, मोहम्मद युनुस तथा गोलू आदि भी पात्रों की साज- सज्जा तथा धनुष बाण बनाने तथा रावण का पुतला बनाने में मदद करते हैं। रामलीला समिति के अध्यक्ष गौतम राय का कहना है कि वह हर साल कुछ बेहतर करने का प्रयास करते है।
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