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पांच स्तंभ में जकात भी है शामिल

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बहरियाबाद (गाजीपुर)। इस्लाम धर्म मानवीय मूल्यों को लेकर भी काफी संवेदनशील है। इसके पांच स्तंभों में एक जकात (दान) भी है। इस्लाम में जिस प्रकार नमाज के लिए जोर दिया गया है। उसी प्रकार हर साहिबे-निसाब (मालदार) को जकात अदा करने के लिए सख्ती से हुक्म दिया गया है। इस्लाम ने गरीबों, मोहताजों, यतीमों, बेवाओं, मुसाफिरों तथा जरूरतमंदों की समस्याओं के निदान का एक उचित और आसान उपाय जकात के रूप में निकाला है।
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जकात लेने एवं देने का एक मानक निश्चित किया गया है। हर साहिबे-निसाब जो कि कम से कम साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी या इतनी ही मालियत के रुपयों, व्यवसाय, अन्न का मालिक हो उस पर जकात फर्ज है और सदक-ए-फित्र अदा करना वाजिब है। सदक-ए-फित्र प्रति वर्ष ईद की नमाज अदा करने से पहले उसके हकदारों तक पहुंचा देनी चाहिए। सदक-ए-फित्र प्रति व्यक्ति पौने दो किलो गेहूं या उसका मूल्य अदा करना चाहिए। आमतौर पर लोग जकात भी प्रत्येक वर्ष रमजान के मुकद्दस महीने में ही अदा करते हैं। रमजान में अधिक सवाब मिलता है। रमजान से पूर्व अगर वर्ष पूरा हो जाए तो देर नहीं करना चाहिए।
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