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ठंड ने बढ़ाई आलू उत्पादक किसानों की मुश्किलें

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दुबिहा। आलू उत्पादक किसानों के लिए प्रतिवर्ष पाला और झुलसा रोग मुसीबत लेकर आता है। ठंड बढ़ने के साथ इनका प्रकोप खेतों में नजर आने लगता है। इसे अगर नजर अंदाज कर दिया गया तो फिर उत्पादन प्रभावित हो जाता है। इसे बचाने के लिए किसान थोड़ा एहतियात और कुछ दवाओं का छिड़काव कर रोगों के प्रभाव से फसल नुकसान होने से बचा सकते हैं। प्रतिवर्ष ठंड अपने साथ भीषण शीतलहर लेकर आती है। इससे आलू उत्पादक किसानों को जूझना पड़ता है।
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क्षेत्र के सैकड़ों एकड़ आलू की फसल पाले और कुहासे के कारण चौपट हो जाती है। लगातार गिरते पारे ने इसकी आशंका बढ़ा दी है। शीतलहर देखकर किसानों को अब आलू के पौधों की सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। फिलहाल मौसम के मिजाज में भी ठंडक बढ़ती जा रही है। ऐसे में आलू उत्पादक किसानों को फसल पर ध्यान देना अति आवश्यक है। बाराचवर ब्लाक के एडीओ एग्रीकल्चर नर्वदेश्वर सिंह का कहना है कि आलू को पाले की मार से बचाने के लिए खेतों में नमी बनाए रखने पर ध्यान देना होगा। अगर खेत में झुलसा रोग की संभावना है तो मैंकोजेब दवा का सवा किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के हिसाब से छिड़काव करना चाहिए। यदि खेत में झुलसा रोग लग चुका है तो इसमें मैंकोजेब और मेटालैक्सिल के मिश्रण वाली दवा का छिड़काव किया जाना चाहिए। यह दवा दो ग्राम प्रति लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग की जाए। इस हिसाब से एक किलोग्राम दवा का उपयोग एक हेक्टेयर आलू में करना चाहिए। पाला पड़ने पर आलू के खेतों में इस रोग का असर दिखाई देने लगता है और आलू की पत्तियों पर छोटी-छोटी काली बुंदी पड़ जाती है। रोकथाम पर ध्यान न दिया जाए तो यह बढ़ने लगती है और झुलसा रोग और इसके प्रभाव में आलू की पत्तियों पर दाग बनने लगते है। साथ ही इनकी निचली सतह पर महीन रोएं दिखाई देने लगते हैं।
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