जिले में सफेद दूध का काला खेल जारी है। दूध में मिलावट कोई नई बात नहीं है। यह सालों से फल-फूल रहा है। पिछले कुछ सालों से सिंथेटिक दूध का कारोबार भी चल पड़ा है। खासकर होली, लगन और पर्व के मौके पर दूध में मिलावटखोरी का खेल रफ्तार पकड़ने लगता है। बाजार में दूध की मांग बढ़ते ही, दूधिए अतिरिक्त मांग को पूरा करने के लिए सिंथेटिक दूध तैयार करने में जुट जाते हैं। विभिन्न केमिकल से तैयार किया गया दूध फायदे की बजाय आम आदमी को काफी नुकसान पहुंचाता है।
दूध हर घर की जरूरत है। इसे हर कोई रोजाना पीता है। दूध से बनने वाली मिठाई, पनीर, खोवा आदि में ज्यादातर दुकानों पर मिलावट की जाती है। होली पर्व पर भी इसकी तैयारी चल रही है। लोग घर-घर में दहीबड़ा, खीर, गुझिया और खोवा बनाने में दूध का प्रयोग करते हैं। इससे दूध की मांग बढ़ जाती है। इस मांग की वजह से मिलावटखोरी भी रफ्तार पकड़ लेती है। दूध से जुड़े ज्यादातर कारोबारी सिंथेटिक दूध तैयार कर बाजारों के साथ ही कालोनियों और लोगों के घरों में इसकी बिक्री करते हैं। सही जानकारी न होने से लोग सिंथेटिक या मिलावटी दूध और शुद्ध दूध के बीच पहचान नहीं कर पा रहे हैं और इसका बेरोकटोक सेवन कर सेहत को खराब होने का न्यौता दे रहे हैं। मजे की बात यह है कि दूध की गुणवत्ता परखने और जांचने के लिए स्थापित विभाग और तैनात अधिकारी पूरे साल चुप्पी साधे रहते हैं। विभागीय अधिकारी खास पर्व पर जांच की खानापूर्ति कर मामले को ठंडे बस्ते में डाल देते हैं। दूध की जांच-पड़ताल न होने तथा निरंतर सैंपल आदि न लेने की वजह से दूधियों को कानून का भय नहीं लगता। अगर दूध विक्रेताओं की निरंतर चेकिंग की जाए तो, निश्चित ही मिलावटखोरी में काफी हद तक गिरावट आएगी।
एक कारोबारी ने बताया कि सिंथेटिक दूध की यह पहचान है कि यह स्वाद में कड़वा लगता है। उंगलियों के बीच रगड़ने पर साबुन जैसा चिकनापन लगता है। गर्म करने पर पीला पड़ जाता है। इसे तैयार करने में डिटरजेंट, पानी सहित कई प्रकार के केमिकल मिलाए जाते हैं। दूध में पानी मिलावट की पहचान को बताते हुए कहा कि दूध की बूंद को चिकनी सतह पर गिराएं। अगर बूंद धीरे बहे और सफेद निशान छोड़े तो शुद्ध दूध है। मिलावटी दूध की बूंद बिना निशान छोड़े तेजी से बह जाएगी। बताया कि होली और लगन के मौसम में सिंथेटिक दूध के धंधे का रफ्तार काफी बढ़ जाता है।
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कोट :
जिले में सिंथेटिक दूध का कोई मामला सामने नहीं आया है। अक्सर यहां के दूध में फैट आदि की मात्रा देखी गई है। विभाग की ओर से लगातार खासकर त्योहारों में मिलावटी दूध को लेकर अभियान चलाया जाता है। अजीत कुमार मिश्र, अभिहित अधिकारी
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लेक्यो मीटर से भी नहीं होती दूध की पहचान
गाजीपुर। डिप्टी सीएमओ डा. आरके सिन्हा ने बताया कि सिंथेटिक दूध के निर्माण में सैम्पू और पेस्ट को अच्छी तरीके से मिलाकर झाग तैयार कर लिया जाता है। इसके बाद उसमें आधा किलो दूध डाल दिया जाता है। दोनों के मिश्रण को तैयार करने के बाद गर्म पानी डालकर आधा लीटर दूध को दस लीटर तक बनाया जाता है। इस दूध की पहचान लेक्योमीटर से भी नहीं की जा सकती है।
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गंभीर बीमारियों को जन्म देता है सिंथेटिक दूध
गाजीपुर। सिंथेटिक दूध के संबंध में डा. आरके सिन्हा ने बताया कि दूध के सेवन से विभिन्न प्रकार की गंभीर बीमारियां होती हैं। दूध से बने खोवा और पनीर का सेवन करने से लंबे समय बाद पेट में कैंसर, अलसर के साथ ही डायरिया की बीमारी हो सकती है। सिंथेटिक दूध के सेवन से बच्चों का हाजमा खराब हो सकता है। इन बीमारियों से बचने के लिए अच्छा यही होगा आप विश्वासपात्र डेयर से अच्छी गुणवत्ता वाला दूध खरीदें और फिर पैकेट बंद ब्रांडेड दूध का सेवन करें। छोटे बच्चों को ब्रांडेड पाउडर मिल्क दूध पिलाना बेहतर होगा।