होली से एक दिन पूर्व गुरुवार को जनपद के 2297 स्थानों पर मुर्हुत के मुताबिक होलिका जलाई जाएगी। होलिका दहन के बाद लोग उसकी परिक्रमा करेंगे। पर्व से दो दिन पूर्व बुधवार को जगह-जगह लोग इसकी तैयारी कर रहे थे। होलिका दहन के स्थान को साफ-सुथरा करने में लोग जुटे थे। होली की मस्ती लोगों के चेहरे पर अभी से साफ दिखाई देने लगी है। सरकारी और गैर सरकारी दफ्तारों में होली की छुट्टी होने से अधिकांश लोग रंगों से सराबोर नजर आए। कई युवा बाइकों पर होली की टोपी लगाकर बाइक लहराते दिखाई दिए। उधर होलिका दहन और होली के मद्देनजर जगह-जगह पुलिस तैनात की गई थी।
रंगों का पर्व होली के एक दिन पूर्व एक मार्च को शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानों पर कुल 2297 जगह होलिका दहन मुर्हुत के अनुसार देर शाम किया जाएगा। ब्राह्मणों द्वारा पूजन-अर्चन के बीच होलिका जलाई जाएगी। एलआईयू इंस्पेक्टर सुधीर कुमार दुबे ने बताया कि जिले में कुल 2297 स्थानों पर होलिका दहन किया जाएगा। शहर के ददरीघाट निवासी पंडित मुनींद्र उपाध्याय ने कहा कि देर शाम 6.58 बजे के बाद होलिका दहन का मुर्हुत है। उन्होंने होलिका के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि लकड़ी और कंडों की होली के साथ घास लगाकर होलिका खड़ी करके उसका पूजन करने से पहले हाथ में असद, फूल, सुपारी, पैसा लेकर पूजन कर जल के साथ होलिका के पास छोड़ दें और अक्षत, चंदन, रोली, हल्दी, गुलाल, फूल तथा गूलरी की माला पहनाएं। इसके बाद होलिका की तीन परिक्रमा करते हुए नारियल का गोला, गेहूं की बाली तथा चना को भूंज कर इसका प्रसाद सभी को वितरित करें। कहा कि जैसा की हमे मालूम है की होली की शुरुवात होलिका दहन से होती है। बताया कि प्रह्लाद और होलिका का प्रसंग तो लगभग सभी लोग जानते हैं। माना जाता है कि होली पर्व का प्रारंभ प्रह्लाद और होलिका से जुड़ा है। विष्णु पुराण के अनुसार होलिका एक राक्षिसा थी, जिसे भगवान से वरदान प्राप्त था कि वह आग में नहीं जलेगी। होलिका का भाई हिरण्य कश्यप जिसका पुत्र प्रह्लाद था, जो की भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था, जो कि उनके पिता हिरण्य कश्यप को कतई पसंद नहीं था। इसी द्वेष के कारण हिरण्य कश्यप ने अपनी बहन होलिका से उनको जलाकर मारने की युक्ति बनाई। लेकिन जब होलिका प्रह्लाद को लेकर आग में बैठी तो होलिका का वरदान निष्फल सिद्ध हुआ और वह स्वयं उस आग में जलकर मर गई। तभी से लोगो ने इस बुराई की अच्छाई के जीत को होलिका दहन के त्योहार के रूप में मनाना शुरू कर दिया।