अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मायने सिर्फ निर्धारित तिथि पर आयोजित कुछ समारोहों तक ही सिमट कर रह गए हैं। आज भी महिलाओं की स्थिति में कोई ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। घरेलू हिंसा और छेड़खानी जैसे कई मामलों ने तो उन्हें झकझोर कर रख दिया है। बदलते परिवेश में आज भी महिलाओं को अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है।
महिलाओं में जागरूकता की कमी के चलते वह अपने अधिकार के लिए न तो आगे आ पा रही हैं और न ही हिंसा के विरुद्ध आवाज ही उठा पा रही है। यही नहीं, गरीब महिलाओं की पूरी जिंदगी रोटी पाने की जद्दोजहद में गुजर जाती है। महिला और पुरुष दोनों की बराबर समानता से परिवार और समाज का संचालन होता है लेकिन समाज में उनके प्रति हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद नहीं कर पाना जागरूकता के अभाव को दर्शाता है। आज समाज के अंदर सबसे अधिक महिलाएं घरेलू हिंसा से पीड़ित हैं। साथ ही छेड़खानी के कई मामले प्रकाश में आए जिसने महिलाओं को झकझोर कर रख दिया। महिलाओं में जागरूकता का अभाव इतना बना हुआ है कि उन्हें अपने अधिकारों से वंचित होना पड़ रहा है। निर्धारित तिथि पर महिला दिवस तो जरूर मनाया जाता है लेकिन दिवस का महत्व दिवस में ही सिमट कर समाप्त हो जाता है। समाज में हो रहे उनके प्रति अत्याचार का जवाब देने के लिए महिलाओं को जागरूक होना बहुत जरूरी है।