नंदगंज। अघोरपीठ बाबा कीनाराम शिवाला, वाराणसी के तत्वाधान में स्थानीय रामपुर मांझा स्थित बाबा कीनाराम कुटिया में शनिवार को कीनाराम का 419वां जन्म-समारोह धूमधाम तथा विधि-विधान से मनाया गया। इस मौके पर अघोर परंपरा के आधुनिक स्वरूप के जनक माने जाने वाले विश्व-विख्यात महान संत, अघोराचार्य महाराज श्रीबाबा कीनाराम की प्रतिमा पर माल्यार्पण पूजा-पाठ, विचार-गोष्ठी, सांस्कृतिक कार्यक्रम आदि का आयोजन किया गया। गोष्ठी में वक्ताओं ने कहा कि बाबा कीनाराम जी के आदर्शों पर चलने की जरूरत है और समाज व राष्ट्र हेतु यथासंभव अपना योगदान देने की आवश्यकता है।
कुटिया के महंत बाबा कामेश्वर राम की ओर से आरती-पूजन के के बाद कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ। सुप्रसिद्ध भजन तथा बिरहा गायक विजय यादव ने एक अलग अंदाज से भजनों की प्रस्तुति की, जिस पर श्रोता झूम उठे। इसके बाद विचार गोष्ठी और अन्य सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया। बाबा को नमन करते हुए अपने आशीर्वचन में बाबा कामेश्वर राम ने कहा कि यह देश विषम परिस्थितियों में चल रहा है। इसमें कई बुराइयां तथा अच्छाइयां भी हैं। इस बदलते परिवेश में आपको अपने अंदर बदलाव लाना होगा, तभी अच्छे समाज, राष्ट्र, और गांव का निर्माण हो सकता है। आने वाले कुछ वर्षों में इस पीठ के तहत संकल्पित सुंदर व्यवस्था के जरिए परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होगा और एक नई चेतना का संचार होगा। बाबा कीनाराम की अघोर परंपरा तथा इसका सामाजिक एवं आध्यात्मिक सरोक़ार के विषय पर चली। विचार-गोष्ठी में गणमान्य लोगों ने बाबा कीनाराम की अद्भुत-आलौकिक, आध्यात्मिक-सामाजिक चेतना का बखान किया। बलिया के जननायक चंद्रशेखर विद्यालय से आए डॉ. योगेंद्र सिंह ने कहा कि बाबा कीनाराम जी का प्राकट्य कोई एक आध्यात्मिक घटना मात्र नहीं बल्कि भगवान शिव का मानव-तन में आ-मन था। बाबा कीनाराम की आध्यात्मिक चेतना जितनी प्रबल थी, उससे कहीं ज्यादा उनमें मानव-मात्र की सेवा का भाव था। विशिष्ट अतिथि दिनेश नायण सिंह ने अघोर परंपरा को आध्यात्मिक व्यवस्था की सर्वोच्च इकाई करार देते हुए कहा कि आज हमें बाबा कीनाराम जी के आदर्शों पर चलने की जरूरत है और समाज व राष्ट्र हेतु यथासंभव अपना योगदान देने की आवश्यकता है। आध्यात्म में मंत्र और जाप ही प्रमुख है। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मांधाता राय ने अघोर-परंपरा को सेवा से सीधा जोड़ते हुए कहा कि आध्यात्म और समाज एक दूसरे के पूरक हैं, जिन्हें अलग कर नहीं देखा जा सकता। अघोर परंपरा को आध्यात्म और समाज की एक शानदार विरासत बतलाते हुए उन्होंने कहा कि संत-महात्माओं के बताये रास्ते पर चल-सीख कर ही मानवता की सेवा की जा सकती है। उनके सानिध्य से ही मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। चंद्रभूषण शुक्ला ने बाबा कीनाराम एवं अघोर परम्परा पर प्रकाश डालते हुए बहुत गूढ़ जानकारी देते हुए कहा कि प्रकृति हो या समाज, आज सबके संरक्षण की जरुरत है। आज अपनी पुरानी थातियों को खंगालने से हमें बहुत कुछ हासिल हो सकता है। अंत में अतिथियों को अंगवस्त्रम तथा प्रतीक चिह्न भेंट किया गया। इन कार्यक्रमों के चलते पूरे क्षेत्र में धार्मिक वातावरण बना रहा। प्रसाद का भी वितरण किया गया। इस दौरान तेजबहादुर, रामाशीष, सुजीत, अमरनाथ, रामशरण आदि रहे।