स्थानीय गांव के यूनियन बैंक के पास चल रहे नौ दिवसीय संगीतमय श्रीराम कथा के 8वें दिन कथा वाचक संध्या देवी महाराज ने कहा कि ईश्वर पर विश्वास रखने वाले लोग श्रद्धा से झुकते हैं। वहीं कुछ लोग स्वार्थ की पूर्ति के लिए सिर झुकाते हैं। जिस प्रकार मारीच के दरवाजे पहुंचकर लंकेश ने सिर झुकाया। लंकेश सिर झुकाए खड़ा है यह देखकर मारीच आश्चर्यचकित हो गए। उन्होंने मंशा पूछी तो कहा सीता हरण करना है और आपको हिरण बनना है। यह सुनकर मारीच असहमत हुए। इस बात पर लंकेश ने तलवार निकाल ली। लंकेश का यह रूप देख मारीच क्या न करता। रावण की तलवार से मृत्यु से बेहतर विकल्प मारीच ने प्रभु श्रीराम के बाण से मौत स्वीकार की।
उन्होंने कहा कि जिसके मन में परहित की भावना है, उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं है। असल में दूसरों का भला सोचना ही धर्म है। उन्होंने शबरी के जूठे बेर का प्रसंग बताते हुए कहा कि प्रभु राम को कहीं खट्टे बेर न खिला दे, इसलिए वह हर बेर को चखकर देखती थी। यहां उसकी भावना प्रभु के प्रति अपार स्नेह और भक्ति को प्रकट करती है। कहा कि यह वही भारत वर्ष है, जहां युद्ध में भी धर्म होता था। आज धर्म के नाम पर लोग झगड़ा कर रहे हैं। रावण का उल्लेख करते हुए कहा कि बल के साथ विवेक रखना जरूरी है। रावण के भीतर थोड़ा भी विवेक होता तो उसका ऐसा अंत नही होता। कथा में ग्राम प्रधान मीरा देवी, राधिका देवी, शैला देवी, माधुरी सिह, बुधनी देवी, ऊषा देवी, बसंती देवी, गीता देवी, चिंतामनी, जगतराम, सत्यदेव सिंह, सुधीर सिंह, भीष्मदेव सिंह, अशोक सिंह, चंद्रमा सिंह, सुनील सिंह, भरत सिंह, मिथिलेश गहमरी, शशि सिंह, संतोष, सुरेंद्र सिंह, अवधेश सिंह सहित सैकड़ों लोग उपस्थित थे।