गाजीपुर। किसी मंदिर या सार्वजनिक स्थान से फगुआ गाने की शुरुआत होती थी। इसके बाद गांव मुहल्लों के घर-घर जाकर जोगीरा गाया जाता था। गांव के बुजुर्गो तथा तुनकमिजाज लोगों से मजाक का सिलसिला तो पखवारे पहले से ही शुरु हो जाता था। जिसके दरवाजे पर फागुआ गाने के लिए लोग जुटते वहां की शान ही कुछ और होती। अगर वह रस, लाई और गुड़ खिला देता तो उसका खूब बखान होता था। दिन में रंग की होली खेली जाती। शाम को नहा धो कर नए कपड़े पहन घर जा कर अबीर और गुलाल लगा कर पैर छू कर आशीर्वाद लेने का क्रम देर रात तक चलता रहता।
मुहम्मदाबाद के वरिष्ठ शिक्षक प्रदीप कुमार पांडेय ने बताया कि होली में अलग ही रंग चढ़ जाता था। जैसे हर कोई अपना हो और उसे रंग से रंग दो। कई-कई दिन तक रंगीन ही रहते थे। न खाने की सुध न सोने की। बस होली आते ही एक दूसरे के साथ फगुआ गाना, मस्ती लेना और रंग डालना। लोगों में एक दूसरे के प्रति सम्मान और भाई चारा था। इस त्योहार के प्रति एक अलग ही जोश खरोश दिखाई देती थी। अबीर गुलाल लगा कर गले मिलने में बड़ी खुशी मिलती थी। जगह-जगह होली गीत गाए जाते हैं। गाना- बजाना के साथ हंसी- ठिठोली भी होता है। आज भी अपने जमाने की होली को याद कर जवान हो उठते हैं। संवत जलाने के बाद शुरु हुई हुड़दंग में होली कब बीत जाता था। पता ही नहीं चलता था लेकिन बदलते सामाजिक जीवन में इसका रंग फीका पड़ता जा रहा है।
इसी क्रम में बहलोलपुर के विजयशंकर गुप्ता ने बताया कि बसंत पंचमी और शिवरात से ही लोगों पर फगुआ चढ़ जाता था। गांवों में होने वाली चौपालों की बातें, अब चट्टियों के चटखारे बन गई। मान मनुहार जैसी छोटे-छोटे मामले कचहरी की तारीखें बनने लगी। तीज-त्योहार की स्थिति भी किसी से छिपी नहीं है। प्रेम- मुहब्बत तथा भाईचारे के इस पर्व पर हर गलती सही की माफी हो जाती थी। आगामी जीवन को फिर नए उत्साह तथा जोश के साथ शुरू कर देते थे। लेकिन अब परम्परागत होली कहीं खो गई है। आगे आने वाले समय में भी पर्व एक औपचारिकता भर बन कर रह जाएंगे।