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घाटमपुर। दूसरी फाइल (नागपंचमी)

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घाटमपुर। शुक्रवार को नागपंचमी के त्योहार पर गांवों में गुड़िया पीटी गई। पेड़ों पर झूले डाले गए, ग्रामीण दंगल भी लगे और लोगों ने सांपों को दूध पिलाया। गुड़िया पीटने के लिए बच्चों में खास उत्साह दिखाई दिया। सुबह 9 बजे के आसपास जगह-जगह गुड़िया पीटी गई। जबकि, दोपहर बाद गांवों में अखाड़े सजे, जहां युवाओं ने कुश्ती के दांवपेंच दिखाए।
पं. पुत्तन शुक्ला और आशीष तिवारी ने बताया कि सावन के महीने में प्रकृति हरी-भरी होती है। जिसका तात्पर्य है कि हम भी सदैव खुश रहें और दूसरों को भी खुश करने का प्रयास करें। इसी कड़ी में जहरीले सांपों तक को खुश करने के लिए दूध पिलाने की परंपरा है। बताया कि नागों (सर्पों) की पूजा के त्योहार (नाग पंचमी) पर कपड़े से बनी रंग-बिंरगी गुड़िया पीटने के पीछे बच्चों और युवाओं का मनोरंजन है। गुड़िया पीटने के बाद बच्चे और युवक स्नान करते हैं। वहीं, लड़कियां हाथों में दूब घास लेकर अपने घरों को लौटती हैं। पं. उमेश द्विवेदी ने बताया कि दूब को सुख और समृद्धि प्रदान करने वाला माना गया है।
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माना जाता है कि त्योहार में पीटी जाने वाली गुड़िया को बुरी आत्माओं से बचाव किया जाना भी माना जाता है। इस त्योहार पर विवाहित बेटियों को मायके बुलाने की भी परंपरा है जहां उनको शृंगार का सामान रंग, चूड़ियां, कंगन और मेहंदी आदि उपहार में प्रदान किए जाते हैं। पेड़ों पर डाले गए झूलों में ननद और भाभी साथ मिलकर झूले झूलती हैं। जबकि, बच्चे और युवा भी सावन के महीने में झूलों पर पेंग बढ़ना नहीं भूलते हैं।
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पतारा, भीतरगांव और सजेती प्रतिनिधियों के अनुसार नाग पंचमी के त्योहार पर जगह-जगह गुड़िया पीटी गई। अखाड़ों में युवकों ने कुश्ती कला के दांव दिखाए। शाम को सर्पोें के पीने के लिए घरों में और बाहर दूध रखा गया।




नागपंचमी पर पीटी गुड़िया, दंगल में दिखाते दांव
सर्पों को प्रसन्न करने को दूध पिलाने की परंपरा
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