हिंदी साहित्य संगम के तत्वावधान में काव्य संध्या का आयोजन किया गया। काव्य संध्या मेें कवियों ने अपनी कविताओं से लोगों को भावविभोर कर दिया। शुभारंभ दिनेशकांत दोषी ने सरस्वती वंदना से किया।
सबसे पहले डा. राधे श्याम राही ने कहा ‘लोग चाहत के लिए जीते हैं, गैर के गम खुशी से पीते हैं।’ डा. अनिल उपाध्याय ने दीवार पर टंगी घड़ी का पेंडुलम सुनाकर सभी को भाव विभोर कर दिया। गीतकार सुबोध सुलभ ने पढ़ा ‘निकल होठों से अभिव्यक्ति गगन में घूम आती है।’ कवि शंभू दयाल पोरवाल ने पढ़ा ‘अगर मेरी राहें यहां न बनी तो बनाउंगा।’ दिलीप गौड़ ने पढ़ा ‘सूना-सूना घर तेरा खाली-खाली लगता है। देख कर आंखें नम होती हैं यहां हर आदमी बिकता है।’ दिनेशकांत दोषी ने अपने गीत में कहा ‘आंधियां ही फकत थे उठाते रहे और बुझाते रहे।’ इस दौरान चंद्रमोहन कुलश्रेष्ठ, बनवारी लाल शर्मा, राहुल सोलंकी, पीबी शर्मा, अनिल उपाध्याय आदि उपस्थित रहे।