जसराना। दिहुली कांड के प्रमुख गवाह रहे कुमर प्रसाद का परिवार मुफलिसी में जीने को मजबूर है। हत्याकांड के बाद सरकार ने नौकरी तो दी, लेकिन कुछ समय बाद नौकरी से बर्खास्त कर दिया गया। एक तरफ कुमर प्रसाद इंसाफ के लिए तो दूसरी तरफ नौकरी पाने के लिए जंग लड़ते रहे। उनकी मृत्यु के बाद उनका पुत्र नौकरी पाने के लिए जद्दोजहद कर रहा है। वहीं हत्याकांड में घायल हुईं उनकी पत्नी सरवती देवी के कंधे में आज भी छर्रे फंसे हुए हैं। जातीय संघर्ष के बाद गांव दिहुली में 18 नवंबर 1981 को सामूहिक हत्याकांड को राधेश्याम उर्फ राधे, संतोष सिंह उर्फ संतोषा एवं उनके साथियों ने अंजाम दिया था। इसमें 24 लोगों की हत्या हुई थी और नौ लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे। हादसे की विभीषिका तत्कालीन दिहुली निवासी एवं वर्तमान में आगरा के सेवला में रह रही सरवती देवी ने बयां की।
उन्होंने बताया कि राधे-संतोषा गैंग के लोगों ने बस्ती पर हमला कर दिया था। हत्याकांड में उनके देवर, जेठ, जेठानी, देवरानी, ननद, ननदोई, पुत्र और भतीजों की हत्या की गई थी। पति को उन्होंने भूसे में छिपा दिया था। इस दौरान उनके सीने में गोली लगी थी और उसके छर्रे आज भी उनकी कंधे में फंसे हुए हैं, जिनका दर्द आज भी रह रहकर दिहुली के जख्मों को हरा कर देता है।
अपना दर्द बयां करते हुए कहा कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी आईं थीं। उन्होंने अन्य लोगों के साथ पति को प्रशिक्षण सेवा योजना निदेशालय विभाग में चतुर्थ श्रेणी की नौकरी दी थी। 1982 में लगी नौकरी 1991 तक चली। वर्ष 1991 में दिहुली में लगे मेले में एक बार फिर दलित समुदाय के दो लोगों की हत्या कर दी गई। इसका आरोप उनके पति पर डाला गया। आरोपों से फिरोजाबाद की अदालत ने उनके पति को बरी कर दिया, लेकिन विभाग से उनके पति को गैर हाजिर दिखाकर बर्खास्त कर दिया।
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कोर्ट का फैसला आने से पहले ही गांव पहुंच गया पुलिस फोर्स
जसराना। 44 वर्ष पूर्व हुए सामूहिक नरसंहार में मंगलवार को मैनपुरी की डकैती कोर्ट ने फैसला सुना दिया। फैसला आने से पहले ही पुलिस बल गांव में पहुंच गया। इस दौरान गांव में फ्लैग मार्च करने के साथ ही लोगों से संवाद किया। पीड़ित पक्ष के लोगों से किसी भी प्रकार का जश्न नहीं मनाने को कहा तो आरोपियों के घर के पास भी फोर्स तैनात रहा।दिहुली कांड में जेल में बंद रामसेवक, रामपाल और कप्तान सिंह को हत्या के साथ अन्य धाराओं में दोषी माना गया था। अदालत ने 18 मार्च को सजा सुनाने की बात कही थी। इससे पूर्व ही कोतवाल शेर सिंह पुलिस बल के साथ गांव में पहुंचे। उन्होंने बताया गश्त के दौरान लोगों से शांति एवं सौहार्द कायम रखने की अपील की गई है।
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अपनों को खोने का दर्द 44 साल में भी नहीं भूल सका दिहुली
जसराना। दिहुली में 18 नवंबर 1981 की शाम आज भी लोगों की आंखों में बुरे सपने की तरह कैद है। उस दिन पुलिस की वर्दी पहनकर आए एक गिरोह ने अनुसूचित जाति की बस्ती में जमकर तांडव मचाया था। गांव में घुसते ही चार घंटे तक अंधाधुंध फायरिंग की गई। इसमें 24 लोगों की मौत हो गई थी। 9 लोग घायल हुए थे। तब यह मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय में विचाराधीन था। पिछले वर्ष हाईकोर्ट के आदेश पर मैनपुरी में मामले की सुनवाई शुरू की गई।
कभी मैनपुरी में शामिल दिहुली गांव वर्तमान में फिरोजाबाद जिले में जसराना तहसील मुख्यालय से करीब 20 किमी दूर पड़ता है। हत्याकांड में सबसे पहले आरोपियों ने ज्वाला प्रसाद और उनके दो पुत्रों को खेत पर ही गोली मारकर ढेर कर दिया था। गांव में घुसकर चार घंटे तक जो दिखा उसे गोली का निशाना बनाते रहे।
बेरहम हत्यारों ने मासूम बच्चों तक को नहीं छोड़ा। घटना के बाद गांव में हर तरफ खून से लथपथ शव दिखाई पड़ रहे थे। एक घायल की उपचार के दौरान फिरोजाबाद के अस्पताल में मौत हो गई थी। बदमाशों ने हत्या करने के बाद घरों में लूटपाट भी की थी। लायक सिंह ने अगले दिन 19 नवंबर को थाना जसराना में दर्ज कराई थी। इस रिपोर्ट में राधेश्याम उर्फ राधे, संतोष सिंह उर्फ संतोषा के अलावा दो महिलाओं सहित कई लोगों के खिलाफ सामूहिक नरसंहार करने का आरोप लगाया गया था। घटना के दो दिन बाद मुख्यमंत्री वीपी सिंह घटनास्थल पहुंचे थे। वहां पर उनके इस्तीफे की मांग उठी। इसके बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी व विपक्ष के उस समय के नेता पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेई, मुलायम सिंह यादव सहित कई नेता गांव पहुंचे थे।
बाबा साहेब की प्रतिमा पर माला पहनाकर जताई खुशी
जसराना। गांव दिहुली में हुए सामूहिक हत्याकांड में मैनपुरी की डकैती कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। फैसले में तीन आरोपियों को फांसी की सजा सुनाई गई है। पीड़ित परिवार के लोगों ने बाबा साहेब की प्रतिमा के पास एकत्रित हुए और खुशी जताई।
दोपहर फैसले के बाद पीड़ित परिवार के महिला, पुरुष एवं बच्चे डॉ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा के पास पहुंचे। फैसले पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। महिला और पुरुष अदालत के फैसले से खुश नजर आए। चश्मदीद रहे भूप सिंह के साथ छोटेलाल ने घटना के बारे में जानकारी देते हुए घटना की विभीषिका को याद करते हुए कहा कि अदालत ने फांसी की सजा सुनाकर पीड़ितों के साथ न्याय किया है। बोले दिवाली के बाद घटना को अंजाम दिया गया और होली के बाद कोर्ट का निर्णय आया है। मीना देवी, गुड्डी देवी, विरमा देवी, भगवान देवी, शारदा देवी, निर्मला देवी, अमृतलाल, रामलाल, छोछेलाल, भूप सिंह, अनिल कुमार, दौलतराम, राकेश कुमार आदि लोगों ने हर्ष व्यक्त किया है।