यह बदलाव केवल संख्या में नहीं है, बल्कि सोच में आया बड़ा परिवर्तन है। जहां पहले बड़े परिवार को सामाजिक मजबूती का प्रतीक माना जाता था, अब लोग कम संतान को बेहतर परवरिश और भविष्य की कुंजी मान रहे हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच और जागरूकता अभियानों ने इस सोच को मजबूती दी है। एसीएमओ डा. पवन कुमार ने बताया कि अब लोग खुद स्वास्थ्य केंद्रों पर आकर परामर्श ले रहे हैं और संतान की संख्या को सीमित रखने के विकल्पों को अपनाने में झिझक नहीं रहे। ग्रामीण क्षेत्रों में भी जागरूकता बढ़ी है, जो पहले एक बड़ी चुनौती मानी जाती थी। महिलाओं में भी जागरुकता आई है।
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इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की अध्यक्ष डॉ. पूनम अग्रवाल ने बताया कि पहले महिलाएं परिवार नियोजन के बारे में बात करने से भी झिझकती थीं, लेकिन अब वो खुद पूछती हैं कि कौन सा विकल्प उनके लिए बेहतर रहेगा। खासतौर से दो बच्चों के बाद अधिकांश महिलाएं गर्भनिरोधक उपायों को अपनाने लगी हैं। जो मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होती है। अधिक गर्भधारण महिलाओं के शरीर पर असर डालता है, जिससे जटिलताएं बढ़ती हैं।
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