शिवजी के धनुष के टूटने के साथ ही समूचा रामलीला मैदान श्रीराम के जयकारों से गुंजायमान हो गया। इसी के साथ जनक नंदनी जानकी ने श्रीराम के गले में वरमाला डालकर उन्हें वर के रूप में स्वीकार कर लिया। गढ़ी थानी में आयोजित रामलीला को देखने सैकड़ों की संख्या में लोग पहुंचे।
रामलीला में धनुष तोड़ने की लीला का मंचन हुआ। इस मौके पर सर्व प्रथम जानकी के स्वयंवर की जानकारी होने पर मुनि विश्वामित्र राम व लक्ष्मण को लेकर पहुंचते हैं। जहां पूर्व में ही बाणासुर, लंकाधिपति रावण सहित अन्य देशों के राजा महाराजा व राजकुंवर मौजूद होते हैं। इसी दौरान रावण व बाणासुर में विवाद हो जाता है और बाणासुर रावण को झूठ बताता है कि रावण तेरी लंका में आग लग गई है। इसी के साथ रावण स्वयंवर को छोड़ अपनी लंका को बचाने के लिए वापस चला जाता है। इसके बाद देश विदेश के प्रतिभागी शिव धनुष को तोड़ने का प्रयत्न करते हैं। परंतु तोड़ना तो दूर वह उसे हिला भी नहीं पाते। किसी भी प्रतिभागी द्वारा धनुष को हिला भी न सकने से राजा जनक द्रवित हो जाते हैं और विलाप करते हुए कहते हैं कि लगता है कि यह धरती वीरों से खाली हो गई है।
यह वाक्य लक्ष्मण को बर्दास्त नहीं होते और वह श्रीराम से शिव धनुष प्रत्यंचा चढ़ाने को कहते हैं। श्रीराम द्वारा प्रत्यंचा चढ़ाने के दौरान शिव धनुष टूट जाता है। जिसकी गूंज तपस्या में बैठे परशुराम को सुनाई देती है और वह क्रोधित होकर जनकपुरी पहुंच जाते हैं। जहां लक्ष्मण व परशुराम में काफी वाद-विवाद होता है। तब क्रोधित परशुराम धनुष तोड़ने वाले को मारने के लिए उद्धत हो उठते हैं। इसी दौरान उन्हें श्रीराम की छाती पर पगचिह्ïन देख कर उनकी पहचान होती है और वह क्षमा याचना करते हैं। इस दौरान अनेक मनोरंजक लीलाओं व जोकर बने पात्रों ने सभी को काफी हंसाया।