फिरोजाबाद। कहने को तो वे खाकी के सबसे जमीनी मददगार हैं और गांव की सुरक्षा का कान और आंख कहे जाते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आज ग्राम चौकीदार खुद अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे हैं। महंगाई के इस दौर में मात्र 2500 रुपये प्रति माह के मानदेय पर काम कर रहे इन चौकीदारों के सामने पेट भरने का संकट खड़ा हो गया है। गणित सीधा है लेकिन दर्दनाक, एक चौकीदार की दैनिक कीमत महज 83.33 रुपये है।
नियमों के मुताबिक, एक महीने में इन चौकीदारों को चार बार थाने पर जाकर हाजिरी देनी होती है और वहां की ड्यूटियां निभानी पड़ती हैं। गांव से थाने तक आने-जाने का खर्च भी इनकी जेब पर भारी पड़ता है। पुराने समय में जो चौकीदार पुलिस और जनता के बीच की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते थे, आज वे व्यवस्था के हाशिए पर खड़े हैं। कुल 928 पद स्वीकृत हैं, लेकिन वर्तमान में केवल 817 चौकीदार ही तैनात हैं। विडंबना यह है कि इन पदों को भरने के लिए युवा आगे नहीं आ रहे हैं। कम वेतन और भविष्य की अनिश्चितता के कारण नई पीढ़ी इस जिम्मेदारी से कतरा रही है।
मौसम की मार, भत्ते का अभाव
चौकीदारों का काम आसान नहीं है। जब लोग घरों में सोते हैं, तब ये कड़कड़ाती ठंड, मूसलाधार बारिश और झुलसाती गर्मी में रात-रात भर गांवों की गलियों में पहरा देते हैं। हैरानी की बात यह है कि इतनी कठिन ड्यूटी के बावजूद उन्हें कोई अतिरिक्त भत्ता या सुरक्षा उपकरण नहीं मिलता। लंबे समय से इनको वर्दी भी नहीं मिली है।
चौकीदारों का दर्द
83 रुपये में तो आज के समय में एक वक्त का राशन भी नहीं आता। बच्चों की पढ़ाई और दवा का खर्च तो दूर की बात है। हम पुलिस के लिए सूचनाएं जुटाते हैं, रात भर जागते हैं, लेकिन हमारी सुध लेने वाला कोई नहीं है।
- अर्जुन, हुसैनपुर, नारखी
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यदि समय रहते सरकार और प्रशासन ने हम ग्राम रक्षकों के मानदेय पर विचार नहीं किया, तो ग्रामीण सुरक्षा का यह ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है। सवाल वही है कि क्या 83 रुपये में किसी का घर और आत्मसम्मान दोनों सुरक्षित रह सकते हैं।
- कांता प्रसाद, मार्शलगंज, नारखी
फोटो 1 अर्जुन, हुसैनपुर, नारखी