फिरोजाबाद। सुहागनगरी का होली पर लगने वाला फूलडोल मेला अब सिर्फ मंचीय कार्यक्रम एवं कुछ खेल तमाशों तक सीमित रह गया। युवा इस प्राचीन परंपरा की लकीर पीट रहे हैं। बुजुर्गों की मानें तो पहले नीम के पेड़ पर फूल लटकाया जाता था शहर से गांव तक युवा निशाना लगाने आते थे। लेकिन अब सिर्फ मंचीय कार्यक्रम संचालित होते हैं।
सुहागनगरी के मोहल्ला कोटला में होली के बाद गारे-मिट्टी की होली के साथ दोपहर बाद फूलडोल मेला का आयोजन होना यहां की प्राचीन परंपरा थी। परंपरा तो यह थी कि फूल पेड़ पर काफी उंचाई पर लटकाया जाता था। फूल पर युवा लाइसेंसी हथियार से निशाना साधते थे। जो जीत जाता था उसे मेला में कंधे पर उठाकर घुमाने के साथ उसको पगड़ी पहनाकर स्वागत मेला कमेटी करती थी। यह प्राचीन परंपरा तो बंद हो गई। बुजुर्गों की मानें तो पुलिस एवं प्रशासन के हस्तक्षेप के चलते प्राचीन परंपराओं को बंद कर दिया गया था। उनका कहना था कि भीड़ के बीच फायरिंग अच्छी नहीं है। हादसा हो गया तो कौन जिम्मेदार होगा। समझदारी का परिचय देते हुए रिवाज को समाप्त कर दिया गय।
दतौजी के तुलसी के नाम रहा कई मेलों का पुरस्कार
-80 वर्षीय बुजुर्ग रघुवीर सिंह यादव कहते हैं कि मेरे घर से ही फूल एवं थाली लेकर फूलडोल मेला में जाते थे। फूल को नीम के पेड़ पर बांधने के बाद लाइसेंसी हथियारों से निशाना साधा जाता था। गांव दतौजी के निवासी मुरारीलाल के बेटा तुलसी कई बार पुरस्कार जीतकर ले गया। रघुवीर सिंह कहते हैं कि फूल लटकाते ही रायफल से सीधे फूल पर निशाना लगाता था। इनामस्वरूप स्वागत और पुरस्कार दिया जाता था।
फूल उड़ाने के लिए पहले से करते थे अभ्यास
-बुजुर्ग सुरेशचंद्र कहते हैं कि फूलडोल मेला का आयोजन बुजुर्ग रघुवीर सिंह के बाबा भोजराज सिंह के समय से होता चला आ रहा था। फूल उड़ाने को युवा होली आने से पहले तैयारी करते थे। ताकि होली के मौके पर पुरस्कार जीता जा सके। लेकिन अब परंपरा समाप्त हो गई। हालांकि युवा एक दिवसीय मेला को कराने की परंपरा कायम रखे हुए हैं।
दो दशक पूर्व से बंद हो गई प्राचीन परंपरा
-साठ वर्षीय बलवीर सिंह उर्फ पप्पू कहते हैं कि फूलडोल मेला करीब दो दशक पूर्व बंद हो गया था। थाना दक्षिण के तत्कालीन एसएचओ केडी चौधरी ने मेला में आकर कहा था कि यदि फूलडोल मेला के दौरान हथियार चलेंगे। कोई हादसा हुआ (किसी के गोली लगी) तो कमेटी वालों को जेल भेजने की कार्रवाई की जाएगी। इसके कारण फिर फायरिंग का कार्यक्रम बंद हो गया।
निशाने के साथ निकलती थी फाग की टोली
-छोटेलाल यादव कहते हैं कि उस समय मेला का अंदाज ही अलग था। एक ओर निशानेबाजी चलती थी तो दूसरी ओर फाग की टोली निकलती थी। लेकिन बदलते समय के साथ यह परंपरा फीकी पड़ती जा रही है। समाज के बुजुर्ग आज भी ढोलक थामकर क्षेत्र में घर-घर जाकर फाग गाते हैं। त्योहार को लेकर इस पीढ़ी के युवाओं में उत्साह नहीं दिखता।