फतेहपुर। चैत्र नवरात्र में नौ दिनों तक मां के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। सोमवार को नवरात्र का तीसरा दिन है और इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप चंद्रघंटा माता की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता चंद्रघंटा को राक्षसों का वध करने वाला कहा जाता है। माता चंद्रघंटा के मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र बने होने के कारण इन्हें मां चंद्रघंटा कहा जाता है।
माता चंद्रघंटा का वाहन सिंह है। दस हाथों में चार दाहिनी हाथों में कमल का फूल, धनुष, जप माला, तीर और पांचवां हाथ अभय मुद्रा में रहता है। वहीं चार बाएं हाथों में त्रिशूल, गदा, कमंडल, तलवार और पांचवां हाथ वरद मुद्रा में रहता है। मां चंद्रघंटा सदैव अपने भक्तों की रक्षा के लिये तैयार रहती हैं। इनके घंटे की ध्वनि के आगे बड़े से बड़ा शत्रु भी नहीं टिक पाता है।
मां चंद्रघंटा की पूजा विधि
माता की चौकी पर माता चंद्रघंटा की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धिकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें।
इसके बाद पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों से मां चंद्रघंटा सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें।
इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अध्र्रय, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधितद्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा, मंत्र पुष्पांजलि आदि करें। तत्पश्चात प्रसाद वितरण कर पूजन करें।
मां चंद्रघंटा का भोग
कन्याओं को खीर, हलवा या स्वादिष्ट मिठाई भेट करने से माता प्रसन्न होती है। माता चंद्रघंटा को प्रसाद के रूप में गाय के दूध से बनी खीर का भोग लगाने से जातक को सभी विघ्न बाधाओं से मुक्ति दिलाती है।