अच्छी फसल की आस लगाए किसानों को इस बार भी प्रकृति की बेरुखी का शिकार होना पड़ा। अन्नदाता की मेहनत से तैयार की गई फसलें लहलहाती नजर आईं, लेकिन मौसम अनुकूल न होने से पैदावार कमजोर हो गई है। अच्छी उपज की आस लगाए किसानों की उम्मीदों पर फिर पानी फिर गया है।
अन्न का भंडार कही जाने वाली दोआबा की धरती पर हर वर्ष बुंदेलखंड जैसे हालात पैदा हो रहे हैं। जलस्तर घटता जा रहा है। सिंचाई के साधारण संसाधनों से पानी निकलना बंद हो गया है। फसल में अच्छी पैदावार को लेकर फसलों में खाद, बीज और सिंचाई करने वाले किसानों की लागत तक नहीं निकल पा रही है।
कुछ अधिक पैदावार करने की आस में अन्नदाता कर्ज में डूबता जा रहा है। जिले में करीब दो लाख 63 हजार हेक्टेयर भूमि खेती योग्य है, जिसमें एक 75 हजार 193 हेक्टेयर में गेहूं की फसल काटने के लिए तैयार है। सर्दी के मौसम में पर्याप्त ठंड न पड़ने और फरवरी, मार्च में गर्मी ने गेहूं की फसल को समय से पहले ही सूखा दिया है, जिससे बालियों में बन रहा गेहूं का दाना सिकुड़ गया है।
15 बीघा गेहूं की फसल बोई थी। फसल बुआई में खाद और बीज खरीदने के लिए साहूकार से कर्ज लिया था। फसल में अच्छी पैदावार न होने से खाद, बीज का रुपया भी निकलना मुश्किल है। साहूकार लिए गए कर्ज को वसूलने के लिए दबाव बना रहा है। किसान राजकुमार
तीन साल पहले केसीसी से लोन लिया था। दैवी आपदा से लगातार फसलें बर्बाद हो रही हैं। बैंक से लिए गए लोेन का ब्याज तक चुका नहीं पा रहे हैं। कर्ज चुकाने का कोई विकल्प नहीं नजर आ रहा है। लोन की धनराशि के बराबर ब्याज हो गया होगा। किसान रामाधीन
खेती से ही परिवार का पालन पोषण करते हैं। प्रकृति की मार ने पूरी तरह से बर्बाद कर दिया है। गेहूं की फसल ठीक दे रही थी। ऐसा लग रहा था कि कुछ कर्ज से राहत मिल जाएगी, लेकिन गेहूं की बालियों में दाना सही सलामत नहीं बना है। दाना पतला और कम है। किसान अशोक
पांच बीघा खेत है, जिसमें गेहूं की फसल खड़ी है। अच्छी फसल तैयार करने के लिए बैंक से लोन लेकर खाद, बीज खरीदा था। शुरुआत में तो फसल हरीभरी रही, लेकिन पर्याप्त ठंड न होने से पौध में अंकुर अधिक नहीं निकले और गर्मी से दाना भी खराब हो गया। किसान राधे