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रातोंरात स्थापित की गई ददुआ के माता-पिता की मूर्ति

Thu, 11 Feb 2016 01:14 AM IST
ब्यूरो अमर उजाला फतेहपुर
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दस्यु ददुआ के बनवाए शिवहरे राम जानकी हनुमान मंदिर नरसिंहपुर-कबहरा में कयासों को विराम देते हुए मंगलवार रात उसके माता-पिता कृष्णा देवी व राम प्यारे सिंह की मूर्ति स्थापित हो गईं। यह सब इतना गुपचुप हुआ कि किसी को कानोंकान खबर तक नहीं लगी। यह मूर्तियां ददुआ के माता व पिता की हैं।
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बुधवार को  सुबह 11 बजे जनता के भारी हुजूम के बीच मूर्ति प्रतिष्ठा का कार्यक्रम हुआ। क्षेत्रीय जनता ने जोश-खरोश के साथ हनुमान के जयकारे लगाते हुए दस्यु परिवार के पूर्वजों का महिमा मंडन कर इस परिवार के प्रति अपनी चाहत का इजहार कर दिया।

 
बता दें कि अमर उजाला ने बुधवार के अंक में 'ददुआ की मूर्ति स्थापित करने की जगह तय शीर्षक से खबर प्रकाशित की थी, जिसमें ददुआ के अलावा उनकी माता कृष्णा देवी, पिता राम प्यारे व पत्नी सिया देवी की मूर्तियां धार्मिक महोत्सव के दौरान लगाने का जिक्र था।
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ददुआ के भाई एवं मिर्जापुर से पूर्व सांसद बाल कुमार पटेल ने दावा किया था कि उनके माता-पिता की मूर्तियां स्थापित होने से कोई रोक नहीं पाएगा, जबकि भाई व भाभी की मूर्तियों के बाबत शासन- प्रशासन से बात चलने की बात कही थी।

 
मंगलवार रात आठ बजे ददुआ के भव्य मंदिर का मुख्य गेट बंद होने के बाद उनके माता व पिता की मूर्तियों को तहखाने से निकालने का काम शुरू हो गया। रात साढ़े नौ बजे के बाद इन दोनों मूर्तियों को तयशुदा जगह पर पहुंचाया।


बुधवार को सुबह मंदिर के पट खुले तो मुख्य गेट से प्रवेश करने पर लॉबी के उत्तर-पूर्व दिशा में ददुआ के माता-पिता की मूर्ति रखी थीं। इन मूर्तियों की प्रतिष्ठा ठीक पूर्वांह् 11 बजे की गई। वैदिक मंत्रोच्चारण के बीच हुई प्रतिष्ठा मेें जनता का सैलाब उमड़ पड़ा। मंदिर और उसके आसपास के इलाका में यह जनता मूर्ति स्थापना को लेकर खासी प्रफुल्लित नजर आई।
  


दक्षिण की ओर तैयार हुए दो फाउंडेशन - नरसिंहपुर-कबरहा मंदिर की लॉबी में बुधवार को ददुआ के माता व पिता की मूर्ति स्थापित हो गई।



उत्तर की तरफ स्थापित इन मूर्तियों के विपरीत दक्षिण दिशा में दो फाउंडेशन तैयार हैं, इनमें से एक चौकोर है, जबकि दूसरा कम चौकोर। चूंकि फाउंडेशन को कपड़े से ढक रखा गया है। ऐसे में यह मानकर चला जा रहा है कि यहीं पर ददुआ और उनकी पत्नी की मूर्ति स्थापित होगी। हालांकि इस मामले मे कोई कुछ बताने को तैयार नहीं है।




राम हैं त्याग, करुणा और समर्पण की प्रतिमूर्ति- राम तो त्याग करुणा और समर्पण की प्रतिमूर्ति हैं। परमात्मा हृदय में बैठे हैं। इस भेद को सिर्फ ज्ञानी ही जानते हैं। समय - समय पर भक्त पर कृपा करने के लिए प्रभु का अवतार होता है। वह दया सागर, करुणानिधान और संसार के पालनहार हैं।

 
शिवहरे रामजानकी हनुमान मंदिर में चल रही रामकथा के सातवें दिन युवराज स्वामी बद्री प्रपन्नाचार्य ने कथा का रसपान कराया।


कहा कि वनवास और राज्याभिषेक यह दोनों विपरीत परिस्थितियां हैं, लेकिन प्रभु तो हमेशा सम रहते हैं। व्यक्ति को कभी विचलित नहीं होना चाहिए। सुख हो या दुख, हमेशा एक ही भाव मन में रखते हुए ईश्वर के प्रति अनुराग बरकरार रखना चाहिए, जब तक इंद्रियां हमारे वश में नही होंगी, तब तक साधना करना कठिन है।


साधना सतत प्रयास से ही संभव है। एक आसन पर बैठने का अभ्यास करना चाहिए और जब आसन पर बैठने का अभ्यास हो जाए, तब ध्यान लगाना चाहिए। रामकथा कहते हुए प्रपन्नाचार्य बोले कि एक तरफ अयोध्या में राज्याभिषेक की तैयारियां चल रही हैं। चारों ओर प्रसन्नता का माहौल है। वहीं मंथरा ने इस खुशनुमा माहौल में विष घोलने का काम किया।
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