धाता। मौसम की मार ने महुआ की पैदावार पर भारी असर डाला है। क्षेत्र में आंधी, बारिश व मौसम में हुए बदलाव के कारण महुआ के फूल समय से पहले झड़ गए और कम मात्रा मे पैदा हुए। इससे ग्रामीणों की आमदनी पर बड़ा असर पड़ा है। लोग परेशान हैं। ग्रामीण इलाकों में मार्च से अप्रैल के बीच महुआ के पेड़ फूलों से भर जाते हैं। गांव की अधिकांश महिलाएं सुबह-सुबह महुआ का फूल इकट्ठा कर उसे सुखाकर बाजार में बेचती हैं। इससे उन्हें 60 से 70 रुपये प्रति किलो की आमदनी होती है। यह आमदनी गांव के कई परिवारों के लिए एक अहम सहारा होती है।
महुआ का उपयोग वर्षों से ग्रामीण जीवन में होता आ रहा है। इसे सुखाकर, उबालकर, चूर्ण बनाकर या पूड़ी-पकौड़ी के रूप में खाया जाता है। खासतौर पर यह पेट की बीमारियों के लिए लाभदायक माना जाता है। गरीबों के देशी मुनक्का कहे जाने वाले महुआ की मांग अब शहरों तक भी पहुंच गई है। बदलते मौसम कारण इसकी पैदावार लगातार प्रभावित हो रही है।(संवाद)