दुल्ला भट्टी वाला हो! दुल्ले दी धी बिहाई हो, शेर शक्कर पाई। सर्द रात को जल रही लोहड़ी के इर्द-गिर्द मशहूर पारंपरिक लोकगीत की गूंज रही तानों और ढोल की थापों के बीच उल्लास और उत्साह से मनाया गया लोहड़ी का पर्व। लोगों ने एक दूसरे को त्योहार की बधाई दी। दुख भुलाकर लोगों ने सर्दी के मौसम में लोहड़ी से राहत और खुशी महसूस की।
त्योहार के एक दिन पहले कहीं पिन्नी (लड्डू) बनाएं तो कहीं गजरेला (गाजर का हलवा) बना। मार्केट भी गुलजार रहे। पापकार्न, रेवड़ी, मूंगफली, गजक, चिक्की की दुकानों में काफी भीड़ उमड़ी। सिख महिलाएं लोहड़ी की खरीदारी करती हुई नजर आई। मंगलवार सुबह से ही नगर में लोहड़ी पर्व मनाने की तैयारी चल रही थी।
शाम को गुरूद्वारे में श्री गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष संतोष सिंह ने लोहड़ी जलवाई। लोगों ने लोहड़ी को गजक, रेवड़ी, मूंगफली और पापकार्न आदि समर्पित किया। इसके बाद लोग ढोल की थाप पर पारंपरिक लोकगीत गाते और भांगड़ा, गिद्दा डालते रहे। इस मौके पर पपिंदर सिंह, राजेंदर सिंह, कुलवंत सिंह, दर्शन सिंह, सेठी, जगदीप कौर, हरप्रीत कौर, मंजीत कौर, सतवीर कौर और ज्योति आदि मौजूद रहे।
श्री गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष संतोष सिंह ने बताया जहांगीर के शासन काल में अत्याचार बढ़ रहा था। उस समय दुल्ला भट्टी बेटियों को मुक्त कराकर उनकी शादी कराते थे। शादी में रोशनी के लिए आग जलाई जाती थी तभी से लोहड़ी का पर्व मनाने का सिलसिला शुरू हो गया।