छठ पूजा मंगलवार को है। इसको लेकर पूर्वांचल और बिहार
से शहर में बसने आए लोगों में गजब का उत्साह दिखा। उनका कहना था कि छठ
पूजा से खुश होइके छठ मइयां हमैं सबै कुछ देइहं।
कार्तिक मास की
अमावस्या को दिवाली मनाने के बाद व्र्रत की सबसे कठिन और महत्व वाली रात
कार्तिक शुक्ल की षष्ठी की रात होती है। इस व्रत को छठ के नाम से जाना जाता
है।
महिलाएं व्रत रखने के साथ ही उगते और अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देकर
उपासना करती हैं। आचार्य पं.दुर्गादत्त शास्त्री ने बताया कि यह पर्व
भगवान सूर्यदेव की आराधना का है।
सूर्य अर्थात रोशनी, जीवन एवं ऊष्मा के
प्रतीक की पूजा-अर्चना छठ के रूप में की जाती है। सूर्य देव और छठी मइया का
संबंध भाई बहन का है। यह पर्व चार दिनों का होता है।
भइया दूज के तीसरे
दिन से कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को शुरू होकर कार्तिक शुक्ल सप्तमी तक चलता
है। पहला दिन ‘नहाय खाय’ के रूप में मनाया गया। इसके बाद सोमवार को दूसरे
दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रत रखा जाता है।
दिनभर उपवास रखने के बाद शाम
को भोजन करते है। इसके बाद प्रसाद बांटा। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस
में चावल से बनी खीर के साथ दूध, चावल का पिठ्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई
गई।
तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी यानी मंगलवार को दिन में छठ का प्रसाद
बनाया जाएगा। प्रसाद के रूप में चावल के लड्डू बनाते हैं। इसके अलावा
चढ़ावा के रूप में लाया गया फल भी प्रसाद के रूप में शामिल किया जाता है।
शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बांस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया
जाएगा। व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सभी लोग सूर्य को अर्घ्य देते है।
चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उगते सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
इसके बाद शाम को अस्त होते सूर्य को अर्घ्य देंगे। अंत में व्र्रती कच्चे
दूध का शरबत पीकर और थोड़ा प्रसाद खाकर व्रत पूरा करेंगे।