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... तो सौ रुपए की फीस जमा कर जानिए अपनी संपत्ति की मालियत

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फतेहपुर। प्रदेश सरकार की कैबिनेट में संपत्तियों पर लगने वाले स्टांप शुल्क को डीएम से तय कराने का प्रस्ताव हाल ही में मंजूर किया है। अब यह प्रस्ताव शासनादेश के रूप में रजिस्ट्री दफ्तर पहुंच चुका है। हालांकि नये आदेश को देखकर यह कहा जा सकता है कि पुरानी दवा को सरकार ने नई शीशी में भरकर प्रस्तुत किया है। दरअसल स्टांप अधिनियम में शुरुआत से दर्ज धारा 31 को प्रभावी रूप से लागू करने की बात कही गई है। अब अंतर इतना सा आया है कि पहले यह काम निशुल्क होता था और अब आपको जिलाधिकारी स्तर से अपनी संपत्ति की मालियत तय कराने के लिए 100 रुपये का शुल्क जमा करना होगा। नई व्यवस्था की नब्ज टटोलती रिपोर्ट :-
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सीधे सपाट भाषा में समझें तो इस धारा के तहत किसी भी आम आदमी को यह अधिकार प्राप्त है कि यदि उसकी भूमि की दर निर्धारित नहीं हो पा रही है तो वह अपनी रजिस्ट्री संबंधी अभिलेख लेकर डीएम के सामने प्रस्तुत हो सकता है और डीएम उस संपत्ति का जो रेट निर्धारित कर देंगे, उसी पर बैनामा हो जाएगा। बानगी के तौर पर यदि जमीन के किसी एक ही नंबर पर खेत भी हैं और कुछ हिस्से में मकान भी बने हुए हैं, तो रजिस्ट्री दफ्तर और क्रेता के बीच में अक्सर यह पेंच फंसता है कि स्टांप आवासीय दर के हिसाब से लगेगा या कृषि क्षेत्र के हिसाब से। क्योंकि एक ही गाटे में दोनों प्रकृति के स्टांप लगने की संभावना है। ऐसे में क्रेता अपनी तैयार डीड डीएम के पास लेकर जाएगा। जिसमें डीएम संपत्ति की प्रकृति की जांच कराकर अपनी ओर से रेट तय कर देंगे।
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रेट निर्धारण के दौरान यदि क्रेता की डीड तैयार है और डीएम ने जांच पूरा कराकर रेट तय कर दिया है। तब इसके बाद धारा 32 का अहम प्रयोग होगा। जिसमें डीएम को संबंधित डीड को प्रमाणित करना होगा। डीएम के प्रमाणक के बाद उस संपत्ति पर भविष्य में स्टांप की कमी का कोई वाद नहीं चलेगा। यदि बिना डीड प्रस्तुत किए ही कोई डीएम से रेट तय कराता है तो उसमें धारा 32 प्रयोग नहीं होगी और ऐसी स्थित में कभी भी क्रेता के विरुद्घ स्टांप बकाएदारी का वाद चलाया जा सकेगा।
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नई व्यवस्था से यह होंगे फायदे
- बड़े निवेशकों को सरकारी मशीनरी द्वारा स्टांप वादों से परेशान नहीं किया जा सकेगा।
- ऐसी संपत्तियां जो मिश्रित प्रकृति की हैं, जैसे किसी बड़े नंबर में दुकान, मकान और खेती, तीनों स्थिति मौजूद रहने पर मूल्यांकन संबंधी अनिश्चितता से मुक्ति मिलेगी।
- पक्षकारों के लिए यह ऐच्छिक प्रक्रिया है। चाहे सीधे रजिस्ट्री दफ्तर आ जाए या जिलाधिकारी के पास जा सकता है।
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यह हो सकते हैं नुकसान
- धारा 31 की प्रक्रिया पूरी करने में समय लगेगा। क्योंकि डीएम पहले तहसीलदार, लेखपाल और सब रजिस्ट्रार से संपत्ति की प्रकृति की जांच रिपोर्ट मांगेंगे। रिपोर्ट देखने के बाद ही अनुमति देंगे।
- यदि तीनों जांच रिपोर्ट में समानता नहीं है तो डीड फंस जाएगी।
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कोट...
स्टांप अधिनियम 1899 की धारा 31 और 32 शुरूआती दौर से ही प्रभावी रूप से काम करती हैं। अब बस बदलाव इतना हुआ है कि अब जो मामले जिलाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत होंगे, उनमें 100 रुपये का शुल्क निर्धारित कर दिया गया है। शेष प्रक्रिया पुरानी ही कार्यरत रहेगी।
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- सुभाषचंद्र मिश्र, एआईजी स्टांप।
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