देह शिवा बर मोहे शुभ करमन से कबहुं न टरो... गीत के बीच सिख समुदाय के लोगों भक्ति में झूमते नजर आए। गुरु गोविंद सिंह का 349 वां प्रकाशोत्सव धूमधाम से मनाया गया। गुरुद्वारे में शबद कीर्तन हुए इसके बाद लंगर में सभी ने प्रसाद छका।
शहर के रेल बाजार स्थित गुरुद्वारे में सुबह से ही सिक्खों के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया। दिनभर शबद कीर्तन का आयोजन हुआ।
गुरुद्वारा श्री गुरु सिंह सभा के अध्यक्ष संतोष सिंह ने बताया कि सिक्खों के दसवे गुरु संत सिपाही महायोद्धा तथा सरवंश दानी गुरु गोविंद सिंह का जन्म बिहार के पटना शहर में हुआ था।
उनके पिता गुरु तेग बहादुर हिंदू धर्म की कुर्बानी के बाद 11 नवंबर सन 1675 को उन्हें गुरु की पदवी प्रदान की गई। वह एक महान योद्धा कवि एवं आध्यात्मिक नेता भी थे।
परिस्थितयां कितनी भी प्रतिकूल हों मानवीय मूल्यों को कभी भी नहीं भूलना चाहिए। गुरु जी का प्रकाशोत्सव हमें यही संदेश देता है। ना कऊ बैरी न ही बेगाना, सगल संग हम कऊ बन आई गीत गाकर संदेश दिया गया।
गुरुजी ने भक्ति व शक्ति का अद्भुत मेल किया। बताया कि उस समय हुकूमत हिंदुओं के धार्मिक चिन्हो जनेऊ, तिलक, चोटी आदि को अपमानित कर रही थी तब गुरु जी ने धार्मिक व सामाजिक अत्याचारों से लड़ने व हिंदुओं को खोया हुआ सम्मान वापस दिलाने के लिए सन 1699 में खालसा पंथ की स्थापना की।
इस दौरान पपिंदर सिंह, कुलवंत सिंह, रजिंदर सिंह, दरशन सिंह, चानण, मंजीत, विद्याभूषण तिवारी, सुधीर श्रीवास्तव, पिम्मी, जितेंद्र पाल, हरजीत कौर, जगजीत, इशर, मंजीत, जसपाल, ज्योति , मंजीत कौर, जागृति तिवारी आदि रहे।
लंगर में भक्तों ने छका प्रसाद
फतेहपुर। गुरु गोविंद सिंह की जयंती पर गुरुद्वारे में लंगर का आयोजन किया गया। दोपहर से शुरू हुआ लंगर देर शाम तक चला। लंगर में सिक्ख समुदाय के लोगों ने बढ़ चढ़कर सेवाभाव से आने वाले लोगों को भोजन कराया। बड़ों के साथ बच्चों ने भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।