बिंदकी के जहानाबाद दंगे ने काजी टोला कोरा में रहने
वाले मोहम्मद अंसारुल हक की एक आंख की रोशनी छीन ली। फतेहपुर से दिल्ली के
एम्स तक इलाज हुआ लेकिन खास फायदा नहीं है। परिवार को टीस है कि पूरा
मुहल्ला उन्हें और उनके परिवार को अच्छे से जानता था फिर भी एक पल में कुछ
शरारती तत्वों ने जीवन भर का दर्द दे दिया।
मकर संक्रांति के दिन जुलूस
के दौरान विवाद के बाद यह दंगा हुआ था। करीब एक हफ्ते तक इलाके में दहशत
का माहौल रहा। अब धीरे-धीरे हालात पटरी पर आ चुके हैं। इसके बावजूद मोहम्मद
अंसारुल का परिवार ऐसा है जिसे इस दंगे की टीस हमेशा सताती रहेगी। दंगे के
दिन को याद कर पूरा परिवार सिहर उठता है।
कुछ शरारती तत्वों की करतूत ने
अंसारुल के शरीर और कॅरियर दोनों को दांव पर लगा दिया। मोहम्मद अंसारुल के
पिता मोहम्मद अब्दुल सत्तार की जहानाबाद में ही फुटवियर की दुकान है। इसी
के सहारे वह पत्नी, चार बेटी और दो बेटे का परिवार चला रहे थे। अंसारुल
इनका छोटा बेटा है।
पढ़ाई में अच्छा होने की वजह से वह प्रतियोगी परीक्षाओं
में बैठ रहा था। दंगे के बाद से कई परीक्षाएं छूट गईं। मोहम्मद
अंसारुल का कहना है कि जुलूस के समय वह मुहल्ले में ही खड़ा था।
झगड़े-विवाद की बात सुनकर सभी दरवाजे पर खड़े हो गए।
अफसोस हमारे पूरे
परिवार को सभी जानते थे, इसके बाद कुछ लड़के मारपीट करते हुए घर में घुसे। तोड़फोड़ की और मुझे सिर और चेहरे लाठी या किसी फरसे से हमला कर दिया। मैं
बेहोश हो गया, इसके बाद होश आया तो अस्पताल में था। आंख और सिर में गहरी
चोट थी।
फतेहपुर से कानपुर, इलाहाबाद और दिल्ली के एम्स तक इलाज करा चुके
हैं। सभी का कहना है कि एक आंख की रोशनी का वापस आ पाना संभव नहीं। बकौल
अंसारुल एम्स में दोबारा सिर की चोट देखने के लिए बुलाया गया है।