फतेहपुर। पंचायत चुनाव में बादा पहुंचाने और बूथ के प्रपत्रों को फाड़े जाने में दोषी पाए जाने पर अदालत ने 22 साल बाद फैसला सुनाया। मुकदमे की खास बात यह रही कि मामले में सभी गवाहों के मुकर जाने के बाद भी अदालत ने वादी की तहरीर को ही ठोस आधार माना और सोमवार को दोषी को दो साल की सजा सुनाई।
मामला औंग थानाक्षेत्र के मनई गांव का है। वर्ष 2000 के पंचायत चुनाव में लेखपाल राजेश कुमार मनई गांव के पोलिंग बूथ से वापस आ रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें गांव के ज्ञानेंद्र सिंह उर्फ ज्ञानू ने रोक लिया और चुनाव को लेकर नोकझोंक करने लगे। इस दौरान ज्ञानू ने लेखपाल के पास मौजूद रहे पोलिंग स्टेशन से संबंधित प्रपत्रों को फाड़ दिया।
ज्ञानू उस वक्त कानपुर के भूगर्भ जल विभाग में कर्मचारी थे। लेखपाल ने इस मामले की सूचना एसडीएम को दी थी और सरकारी काम में बाधा, गाली-गलौज और मारपीट की धाराओं में औंग थाने में मुकदमा दर्ज कराया था।
इसके बाद से मामला ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में विचाराधीन चल रहा था। सरकारी पक्ष की ओर से पैरवी कर रहे अभियोजन अधिकारी सुरेंद्र कनौजिया ने वादी-लेखपाल को न्याय दिलाने के लिए पैरवी की।
उन्होंने बताया कि इस मामले में चार लोगों को गवाह बनाया गया था लेकिन अदालती प्रक्रिया के दौरान चारों गवाही से मुकर गए। मगर न्यायालय ने वादी की तहरीर को ही आधार माना। सोमवार ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट मनोज भास्कर ने अभियोजन अधिकारी सुरेंद्र कनौजिया की ओर से प्रस्तुत किए गए साक्ष्यों के आधार पर ज्ञानेंद्र सिंह को दो साल के कारावास की सजा सुना दी। ज्ञानू तीन वर्ष पूर्व सेवानिवृत्त हो चुका है।