दवाएं खरीदने को बजट में साल-दर-साल कटौती किए जाने
से सरकारी स्वास्थ्य एवं चिकित्सा सेवाएं चरमरा गई हैं। यूजर चार्ज की
व्यवस्था खत्म करने और मरीज को अब पांच दिन की दवाएं देने से भी दवाओं की
किल्लत हो गई है। हालात यह हैं कि सदर अस्पताल में पेट दर्द से निजात
दिलाने वाली दवा तक नहीं है।
सरकार ने अस्पतालों में विभिन्न मदों
का यूजर चार्ज खत्म कराकर बड़ी आबादी को राहत प्रदान की। यूजर चार्ज न लिए
जाने से मरीज और तीमारदारों को राहत मिली। अब तीन दिन के बजाय पांच दिन की
दवाएं दी जा रहीं हैं। इसके अलावा दवाओं की खरीद के बजट में भी कटौती की गई
है।
सरकारी अस्पताल में बनने वाला एक रुपये का पंजीयन पर्चा भी
आफत बन रहा है। यूजर चार्ज बंद किए जाने और पांच दिन की दवाएं दिए जाने का
असर साफ नजर आ रहा है।
सदर अस्पताल के दवा भंडारणगृह प्रभारी आर
बाजपेई के मुताबिक वित्तीय वर्ष 2011-12 तक दवा खरीद के लिए एक करोड़ 30
लाख का बजट मिला था, जो वित्तीय वर्ष 2012-13 में एक करोड़ 20 लाख हो गया।
वित्तीय वर्ष 2013-14 में दवाएं खरीदने को केवल 80 लाख का बजट मिला। चालू
वित्तीय वर्ष में तो 77 लाख ही मिला।
सरकारी इलाज की हकीकत पर नजर
डाले तो जिले का सबसे बड़ा अस्पताल भी किसी न किसी दवा की किल्लत से हमेशा
जूझता रहता है। फिलहाल 118 बेड वाले इस अस्पताल मेें कई महंगी दवाओं के
अलावा पेट दर्द से निजात दिलाने वाली टिकिया तक उपलब्ध्ध नहीं है।
इतना
ही नहीं सप्ताह भर तो एंटीबायटिक का टोटा था, जो लखनऊ से हुई आपूर्ति के
बाद शनिवार की शाम खत्म हो सका है।जिले की अधिकांश पीएचसी और सीएचसी में
मरीजों को बाहर से दवाएं लाने को पर्चा थमा दिया जाता है।
बिंदकी,
जहानाबाद, हथगाम, हुसैनगंज, हरदो, खखरेरू व गाजीपुर सीएचसी के बाहर संचालित
मेडिकल स्टोर सरकारी दवाओं की उपलब्धता की पोल खोल रहे हैं।