अमौली विकास खंड के गांव अरगल के जंगल में स्थित अरगलेश्वर धाम मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है। ऐसी मान्यता है कि करीब पांच सौ वर्ष यहां शिवलिंग होने की जानकारी हुई। मान्यता है कि एक गाय झाड़ियों में खड़ी होकर अपना पूरा दूध पाताली शिवलिंग पर टपका देती थी। इस मंदिर में 1526 संवत का पत्थर भी लगा हुआ है।
अरगल इस्टेट के जंगल में बना अरगलेश्वर धाम के मंदिर की कहानी बहुत ही रोचक व पुरानी है। 500 वर्ष पूर्व अरगल इस्टेट का एक चरवाहा गायों को चराने जाता था, जिसमें एक गाय जब घर आती थी तो उसका दूध गायब मिलता था, जिसमें गाय मालिक चरवाहे पर दूध चोरी से दुह कर पी लेने का आरोप लगाया। दूसरे दिन इस चरवाहे ने गाय पर नजर रखी। जब उसने देखा कि झाड़ी के पास खड़ी गाय का दूध टपक रहा है, तो उसने अन्य चरवाहों को भी इस नजारे को दिखाया। इस खबर को जब उसने गांव वालों को बताया तो इस स्थान की सफाई कराई गई। तब यहां पाताली शिवलिंग देखा गया, तब से यह शिवलिंग आस्था व विश्वास का केंद्र बन गया और अरगल इस्टेट के राजा चंद्रभान सिंह के पूर्वजों व भक्ताें ने मिलकर मंदिर की स्थापना कराई थी।
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25 वर्षों से साध्वी कमलेश्वरी कर रहीं साधना
अरगलेश्वर धाम के शुरुआती दौर में स्वामी श्री 108 वैश्यवानंद महराज शिवलिंग की पूजा अर्चना व मंदिर की देख रेख करते थे। सिद्ध संत ने 119 वर्ष 9 महीने की उम्र पूरी करने के बाद यहीं पर समाधी ले ली थी। वर्तमान समय में विगत 25 वर्षों से साध्वी कमलेश्वरी साधना कर रही हैं। यहां आए दिन रूद्राभिषेक, भंडारे, पूजन हवन, महामृत्युंजय जाप आदि कार्यक्रम आयोजित होते रहते हैं। इस मार्ग में चलने वाली बसों व वाहनों पर लोगों ने अरगलेश्वर बाबा का नाम लिखा रखा है।