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सरकारी बस अड्डे ऐसे कि देखा न जाए

Fri, 06 Jun 2014 05:32 AM IST
Fatehpur
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फतेहपुर। कहते हैं कि किसी परिवार का कद देखना हो तो पहले उसके किचन को जरूर देखें। यही बात जिले के मामले में भी लागू होती है। जिले के सरकारी बस अड्डे, सड़कें, अस्पताल वहां की शान ओ शौकत को पहली नजर में बया करते हैं। आज देखते हैं कि अपने जिले में तीन सरकारी बस अड्डों का क्या हाल है। साफ कहें तो तीनों ही बदहाल है। गरमी में यात्रियों के बैठने के साथ पीने के पानी की व्यवस्था नहीं हैं, वहीं बरसात के महीने में जलभराव के कारण यात्रियों को बैठने का स्थान नहीं मिल पाता है। कुछ माह पूर्व अमर उजाला ने ‘बस अड्डा बने न्यारा’ अभियान भी चलाया था, लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात। तत्कालीन सांसद, स्वयं सेवी संगठनों ने कुछ आश्वासन जरूर दिया, लो, तब तक चुनाव आ गया। अब जनता के रुदन को शासन के कानों तक पहुंचाने की दोबारा कोशिश की जा रही है। हमारा संकल्प है कि जब तक इस बस अड्डों का कायाकल्प नहीं हो जाता, मुहिम जारी रहेगी। जरूरत है आपके साथ की।
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सीन-1
शहर के ज्वालागंज स्थित रोडवेज बस स्टैंड में यात्री सुविधाओं का पूरी तरह से टोटा है। जिला मुख्यालय के इस बस स्टैंड में यात्रियों के बैठने के लिए पर्याप्त छाया तक की व्यवस्था नहीं है। सामने कच्चे दलदल युक्त मैदान में बसें खड़ी करने की व्यवस्था है। मामूली बरसात होने पर यहां जलभराव हो जाता है, जिसमें कई-कई दिनों से बसें फंसी रहती हैं। पूरे बरसात के मौसम में तो एक दो बसे यहां पर फंसी देखी जा सकती है। बस स्टैंड होने के बावजूद यहां से सफर करने वाले यात्री बाहर सड़क पर खड़े होकर बसों का इंतजार करने को मजबूर हैं।

सीन-2
व्यवसायिक नगरी बिंदकी का रोडवेज बस स्टैंड पूरी तरह से जीर्णशीर्ण हालत में है। यहां का टीनशेड काफी पुराने होने के कारण बरसात के मौसम यहां रुकने वाले यात्री भीगने से बच नहीं पाते हैं। साफ सफाई की व्यवस्था ठीक न होने के कारण बाउंड्री के भीतर भी घासफूस खड़ा है। शौच करने के कोई इंतजाम नहीें हैं। यात्रियों के बैठने के लिए बेंच तक नहीं बने हैं। यही कारण है कि यात्री स्टैंड के अंदर के बजाय सड़क पटरी पर खड़े होकर बसों का इंतजार करना ज्यादा सुविधाजनक मानते हैं।
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सीन-3
बांदा जिले के सीमा यमुना नदी के किनारे स्थित ललौली का रोडवेज बस स्टैंड का अस्तिव खतरे में पड़ गया है। करीब एक दशक से यहां पर एक भी कर्मचारी नियुक्त नहीं है, जिससे यहां पर काफी अरसे से ताला बंदी है। लंबे समय से इस इमारत साफ सफाई के साथ रंगाई पुताई काम का काम नहीं हो पाया है। यहां पर अब न तो बसें दिखाई पड़ती हैं और न बसों से यात्रा करने वाले यात्री ही दिखाई पड़ते हैं। भीषण गरमी के मौसम निजी सवारी वाहन यहां जरूर खड़े देखे जाते हैं। यहां पर यात्री सुविधा के नाम पर पीने के पानी तक की व्यवस्था नहीं है।

कोट
‘समस्याओं के निराकरण के लिए कोशिश की जाती है लेकिन यह स्थानीय स्तर का मामला नहीं है। लिखा पढ़ी की जा रही है। शासन स्तर से बजट मिलने पर ही कुछ हो सकता है।’ - जगदीश सिंह, एआरएम, फतेहपुर डिपो
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