फर्रुखाबाद। घुर्रा की मड़ैया कटने के बाद 45 साल पहले बसे गांव दिलीप की मड़ैया मात्र 15 दिन में गंगा की कटान में बह गई। सिंचाई विभाग की तरफ से 7.50 करोड़ रुपये से बनी परकोपाइन भी गांव का अस्तित्व नहीं बचा सकी। अब गांव के लोग छह अलग-अलग स्थानों पर रहकर अपना जीवन काट रहे हैं। गांव का नाम तत्कालीन प्रधान दिलीप राजपूत के नाम पर रखा गया था। वह गांव के सात परिवारों के साथ अपनी 174 बीघा जमीन पर आकर बसे थे। अब 45 से 50 परिवार में 250 जनसंख्या और 150 वोट थे।
सदर तहसील के बिलावलपुर ग्रामसभा के मजरा दिलीप की मड़ैया का गंगा के कटान में इस बार नामोनिशान खत्म हो चुका है। गांव के सबसे बुजुर्ग 80 वर्ष के जंग बहादुर राजपूत बताते हैं कि मूल रूप से वे सब घुर्रा की मड़ैया के निवासी हैं। घुर्रा की मड़ैया करीब एक किमी गंगा दूर दौली की मड़ैया के उत्तर में बसा था। 45 साल पहले घुर्रा की मड़ैया गंगा की बाढ़ में कट गया। उस समय गांव के ही दिलीप राजपूत प्रधान थे। हम सात परिवारों के नाम 174 बीघा जमीन यहां पड़ी थी। प्रधान समेत सभी सातों परिवार आकर अपनी जमीन पर बस गए। तभी से इसका नाम दिलीप की मड़ैया पड़ गया। अब परिवारों की संख्या 45 से अधिक हो गई थी। इससे यहां रौनक थी। हम सब सुख-दुख में चंद मिनट में ही एक साथ होते थे। मगर अब परिवार छह स्थानों पर बिखर गए।
कुछ परिवार सलावत खां से हैवतपुर गांव मार्ग के किनारे और खेतों में रुके हैं, तो कुछ भैरोंघाट व अमेठी में हैं। कई परिवार रहमानी स्कूल और अर्रा पहाड़पुर सब्जी मंडी में वक्त काटने को मजबूर हैं। चंद परिवार ही एक-दो बिस्वा जमीन खरीद सके। सड़क किनारे पॉलिथीन डालकर रातें गुजारने को मजबूर हैं। सिंचाई विभाग ने गांव को बचाने के लिए 7.50 करोड़ रुपये खर्च किए, मगर निरर्थक साबित हुए। दिलीप की मड़ैया खत्म होने के बाद अब दौली की मड़ैया के बाशिंदे भी चिंतित हैं।
फोटो-19 गिरंद सिंह। संवाद
न मुआवजा मिला न पट्टा : गिरंद
फर्रुखाबाद। दिलीप की मड़ैया के गिरंद सिंह बताते हैं कि पिछली साल आई बाढ़ में उनके अलावा गांव के गिरीश, मुनीश, बबलू, गिरंद का मकान भी कट गया था। अभी तक न तो मुआवजा मिला और न ही मकान के लिए पट्टा। वह पिछले वर्ष दो महीने सड़क किनारे परिवार सहित वक्त गुजारने के बाद फिर गांव किनारे खेत में झोपड़ी डालकर रहने लगे। इस बार वह झोपड़ी भी गंगा में समा गई। (संवाद)
-
खाई से हुई दिक्कत : एक्सईएन
पर्रुखाबाद। सिंचाई विभाग के अधिशासी अभियंता (एक्सईएन) दुर्ण कुमार कहते हैं कि यह पहली बार हुआ कि परकोपाइन सफल नहीं हुई। इसके पीछे मुख्य कारण स्लैबनुमा जमीन का न मिलना है। गांव के आसपास पिछली साल कटान से खाई हो गई थी। परकोपाइन बनाने के लिए यदि स्लैब देते तो आधे मकान चले जाते। लिहाजा बालू भरी बोरियां लगाकर कोशिश की गई थी। इसीलिए दिक्कत आई। अब दौली की मड़ैया को बचाने का प्रयास कर रहे हैं।