इंद्र देव भी शायद कल्पवासियों और साधु-संतों की साधना से हिल गए हैं। लोगों की साधना में खलल डालने के लिए सुबह तड़के शुरू हुई बरसात में देर शाम ठहराव जरूर आया लेकिन बूंदाबांदी देर रात तक जारी रही।
कड़ाके की ठंड और ऊपर से बरसते बर्फीले पानी से कल्पवासी और साधु संत बेहाल हो गए। लोग दिन भर लोग झोपड़ियों में बैठे रहे। भारी बरसात के चलते झोपड़ियों से पानी अंदर टपकता रहा।
इससे लोगों की बिस्तर व बुनियादी चीजें भीग गईं। दिन भर लोग आग के सहारे बरसात बंद होने की प्रार्थना करते रहे। बरसात बंद होने के बाद लोग झोपड़ियों को संभालने में भी लग गए। लेकिन इनकी ईश्वर आराधना में कोई कमी नहीं रही, खुले आसमान में चलने वाले धार्मिक अनुष्ठान, भंडारा इत्यादि जरूर प्रभावित हुए।
लोगों ने टेंट लगाकर साधु-संतों को भोजन करवाया। वहीं मेला क्षेत्र में मनोरंजन के सारे कार्यक्रम बंद रहे। प्रशासनिक क्षेत्र में भी कोई भी आयोजन नहीं हुआ। देर शाम पंडित प्रदीप नरायन शुक्ल ने 101 दीपों से घ्ंाटा घड़ियाल के साथ गंगा आरती की।