वस्त्र धुलाई इकाइयों से निकले रसायनिक पानी से अमरूद के बागों पर संकट
खड़ा हो गया है। अमरूद के पेड़ सूख रहे हैं। उत्पादन भी गिर रहा है। इससे
बागवान परेशान हैं। ग्राम पंचायत इन वस्त्र धुलाई इकाइयों को नोटिस दे चुकी
है। बावजूद इसके इकाइयों का जहरीला पानी बदस्तूर नालियों में बहाया जा रहा
है। बाग मालिकानों को डर है कि ऐसे ही हालात बने
रहे तो इलाके में 600
बीघा में खड़े अमरूद के पेड़ खत्म हो जाएंगे। इसके लिए यह माधौपुर की नजीर
देते हैं जहां कभी अमरूद के बाग गुलजार थे। अंगूरी बाग में प्रशासन की
सख्ती से वस्त्र धुलाई करने वाली इकाइयां अमेठी जदीद, अमेठी कोहना व वदनपुर
की ओर शिफ्ट हो गई हैं। इनकी तादाद 18 से 20 है। रंगाई के बाद यहां कपड़ों
की धुलाई होती है। इसके
लिए केमिकल प्रयोग किए जाते हैं। इकाइयों से निकला
जहरीला पानी नाला-नालियों से होकर गंगा में जाता है। इन इलाकों में अमरूद
की बागायत है। 600 बीघे में अमरूद के बाग लगे हैं। इकाइयों से निकला
रसायनिक पानी बागों में भर जाता है। पानी में मौजूद जहरीले रसायन पेड़ को
सुखाने लगते हैं। पेड़ को जमीन से पोषण की बजाय जहरीला पानी मिलने से
उत्पादन भी गिर रहा है। बाग मालिकों की मानें तो 20 से 30 फीसदी तक फल
उत्पादन गिरा है। फल का आकार भी नहीं बढ़ता है। इससे नुकसान उठाना पड़ रहा
है। बाग मालिक मुफीद खां कहते हैं। अंगूरीबाग इलाके में माधौपुर में
अमरूद के बागों को वस्त्र इकाइयों का जहरीला पानी निगल गया। पांच साल में
85 फीसदी बाग खत्म हो गए। वह बानगी के लिए
जावेद के बाग में भरा इकाइयों का
रसायनिक पानी दिखाते हैं। यहीं के सलीम कहते हैं कि बागों में हर माह पेड़
सूख रहे हैं। यही स्थिति रही तो तीन चार साल में बाग उजाड़ हो जाएंगे।
मुफीद खां अमेठी जदीद के प्रधान भी हैं। यह कहते हैं कि पंचायत की ओर से
इकाई मालिकों को बंदी के लिए नोटिस भी दिए जा चुके हैं। एक बार गांव के
लोगों ने तालाबंदी भी की। इसका भी कोई नतीजा नहीं निकला। प्रशासन ने कड़े
कदम नहीं उठाए तो क्षेत्र पूरी तरह से अमरूद के बागों से विहीन हो जाएगा।
एक बीघा में 8 से 12 हजार का नुकसान
अमरूद
का एक पेड़ साल में दो बार फसल देता है। एक पेड़ से एक सीजन में एक
क्विंटल उत्पादन मिलता है। इस समय 10 रुपये किलो थोक में अमरूद बिक रहा है।
इससे एक पेड़ की फसल की कीमत एक हजार रुपये है। एक बीघा में 40 पेड़ लगते
हैं। इस आंकड़े से एक बीघा में 40 हजार रुपये की फसल होती है। वस्त्र धुलाई
इकाइयों के इलाके में शिफ्ट होने से पहले यही गणित था। अब 20 से 30 फीसदी
नुकसान है। इससे 8 से 12 हजार रुपया नुकसान हो रहा है।